वह दौर जब आम बजट से अलग पेश होता था रेल बजट, 92 साल पुरानी परंपरा पर क्यों और कब लगा ब्रेक?

aditisingh
4 Min Read


Railway Budget: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी यानी कि रविवार को देश का आम बजट पेश करेंगी. वित्त मंत्री के रूप में यह उनका लगातार नौवां बजट होगा. सबसे पहले उन्होंने 2019 में बजट पेश किया था. कल पेश होने वाले बजट से देश के हर इंसान, हर सेक्टर, हर वर्ग को काफी उम्मीदें हैं. इस बीच हम आपको बजट से जुड़ी एक पुरानी परंपरा के बारे में बताने जा रहे हैं, जो अब टूट चुकी है. 

अंग्रेजाें के जमाने में शुरू हुई थी यह प्रथा

हमें यह पता है कि बजट में डिफेंस, हेल्थ, एजुकेशन जैसे कई अलग-अलग सेक्टर शामिल होते हैं. रेल बजट भी इसी में आता है, लेकिन क्या आपको पता है कि पहले रेल बजट को अलग से पेश किया जाता था. रेल बजट को अलग से पेश करने की परंपरा 1924 में अंग्रेजों के जमाने में शुरू हुई थी.

उस दौरान स्पेशल कमेटी की तरफ से यह तर्क दिया गया था कि रेलवे का बजट काफी महत्वपूर्ण और बड़ा होता है इसलिए उसे सामान्य बजट के तहत संभाला नहीं जा सकता. 1947 में देश के आजाद होने के बाद भी यह परंपरा 92 सालों तक बिना रूके चलती रही. इसके तहत, रेल मंत्री यूनियन बजट से कुछ दिन पहले रेलवे बजट पेश करते थे, जिसमें कमाई, खर्च, किराए और माल ढुलाई दरों का ब्यौरा होता था.

क्यों खत्म हुई दशकों पुरानी परंपरा? 

वित्त वर्ष 2016-17 तक केंद्रीय बजट से पहले रेल बजट अलग से पेश होता था. 2017 में केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार आई और तब से रेलवे बजट को देश के आम बजट में मिल लिया गया. दरअसल, अलग से रेलवे बजट को खत्म करने की मुहिम को 2016 में NITI आयोग के तहत अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता वाली एक समिति की सिफारिशों के बाद गति मिली.

देबरॉय और अर्थशास्त्री किशोर देसाई द्वारा लिखे गए एक पेपर में समिति ने तर्क दिया कि भारत एकमात्र ऐसा देश है, जो अभी भी इस प्रथा का पालन कर रहा था और आधुनिक सार्वजनिक वित्त में अब इसका कोई व्यावहारिक उद्देश्य नहीं रह गया. पेपर में फाइनेंशियल मैनेजमेंट को मॉडर्न बनाने और सरकारी खर्च की ज्यादा साफ तस्वीर पेश करने के लिए रेलवे फाइनेंस को यूनियन बजट में शामिल करने की सलाह दी गई थी.

समिति के इस प्रस्ताव पर सरकार के अंदर चर्चा हुई. तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने समिति के प्रस्ताव का समर्थन किया. बाद में वित्त मंत्री अरुण जेटली इस मामले को संसद में ले गए, जिसमें राज्यसभा में भी चर्चा हुई. जेटली ने 2017-18 के लिए पहला इंटीग्रेटेड यूनियन बजट पेश किया, जिससे आधिकारिक तौर पर अलग रेलवे बजट खत्म हो गया. 

इससे क्या हुआ फायदा? 

रेलवे बजट को आम बजट में शामिल करने के कई फायदे भी हुए. सबसे पहले इसकी तैयारी और संसद में इस पर बहस करने में जो समय जाता था, उसकी बचत हुई. इससे रेलवे की तरफ से सरकार को मिलने वाला डिविडेंड खत्म हो गया, जिससे उस पर वित्तीय बोझ कम हुआ.

इसका मकसद ट्रांसपोर्ट सेक्टर, रेलवे, सड़कों और जलमार्गों में बेहतर तालमेल बनाना भी था, ताकि इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग एक ही यूनिफाइड फ्रेमवर्क के तहत की जा सके. इससे काफी पारदर्शिता भी आई क्योंकि केंद्र सरकार की कमाई और खर्च को अब एक ही डॉक्यूमेंट में दिखाए जाने से संसद और इन्वेस्टर्स के लिए वित्तीय जांच करना आसान हो गया. 

ये भी पढ़ें:

Budget 2026: क्या क्रिप्टो निवेशकों को मिलेगी टैक्स में राहत? जानिए बजट से निवेशकों की क्या हैं उम्मीदें



Source link

Share This Article
Follow:
Satish Kumar Is A Journalist With Over 10 Years Of Experience In Digital Media. He Is Currently Working As Editor At Aman Shanti, Where He Covers A Wide Variety Of Technology News From Smartphone Launches To Telecom Updates. His Expertise Also Includes In-depth Gadget Reviews, Where He Blends Analysis With Hands-on Insights.
Leave a Comment