नई दिल्ली. आज जब भारत की सड़कों पर SUV और प्रीमियम कारों की भरमार है, तब यह याद करना थोड़ा मुश्किल है कि एक समय ऐसा भी था जब कार सिर्फ अमीरों की चीज मानी जाती थी. 1980 के दशक की शुरुआत तक आम भारतीय परिवार के लिए कार खरीदना किसी सपने से कम नहीं था. इसी दौर में आई मारुति 800, जिसने न सिर्फ भारतीय सड़कों का चेहरा बदला, बल्कि यह भी तय कर दिया कि कार अब लग्जरी नहीं, बल्कि जरूरत हो सकती है.
मारुति 800 का जन्म उस दौर में हुआ जब भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर लाइसेंस राज की जकड़न में था. विकल्प बेहद सीमित थे- हिंदुस्तान एंबेसडर और फिएट पद्मिनी. दोनों ही कारें महंगी, कम माइलेज वाली और तकनीक के मामले में पिछड़ी हुई थीं. वेटिंग पीरियड सालों का होता था और डिलीवरी मिलना किसी लॉटरी जीतने जैसा अनुभव. इसी माहौल में 1983 में मारुति 800 ने एंट्री ली. जापान की सुजुकी के सहयोग से बनी यह छोटी-सी कार आकार में भले ही कॉम्पैक्ट थी, लेकिन इसके पीछे सोच बहुत बड़ी थी- आम आदमी को कार.
कीमत, माइलेज और भरोसे का तिकड़ा
मारुति 800 की सबसे बड़ी ताकत उसकी कीमत थी. जहां दूसरी कारें मिडिल क्लास की पहुंच से बाहर थीं, वहीं मारुति 800 ने पहली बार यह भरोसा दिया कि कम सैलरी पाने वाला इंसान भी कार का मालिक बन सकता है. कम मेंटेनेंस कॉस्ट और शानदार माइलेज ने इसे और आकर्षक बना दिया. यह वह दौर था जब पेट्रोल की कीमत हर परिवार के बजट को प्रभावित करती थी. ऐसे में मारुति 800 का माइलेज लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं था. ऊपर से जापानी तकनीक की वजह से इंजन भरोसेमंद था. स्टार्ट करो और चल पड़ो, यही इसकी पहचान बन गई.
पहली कार, पहली आजादी
मारुति 800 सिर्फ एक वाहन नहीं थी, यह लाखों भारतीय परिवारों की पहली कार थी. बच्चों को स्कूल छोड़ना हो, रिश्तेदारों के यहां जाना हो या गांव की लंबी यात्रा, हर जगह मारुति 800 मौजूद रहती थी. शादी-ब्याह, पूजा-पाठ और त्योहारों पर नई कार का रिबन काटना एक भावनात्मक पल बन गया. कई लोगों के लिए यह पहली बार था जब वे बस या ट्रेन के बजाय अपनी गाड़ी से सफर कर रहे थे. यही वजह है कि मारुति 800 ने भारतीय मिडिल क्लास को एक नई आजादी का एहसास कराया.
सर्विस नेटवर्क ने जीता दिल
मारुति की एक और बड़ी उपलब्धि थी उसका सर्विस नेटवर्क. उस समय कार खराब होने का मतलब था हफ्तों तक गैराज के चक्कर. मारुति ने देशभर में सर्विस सेंटर्स और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता सुनिश्चित की. नतीजा यह हुआ कि कार रखना आसान और भरोसेमंद बन गया. ग्रामीण और छोटे शहरों तक मारुति की पहुंच ने इसे हर वर्ग की पसंद बना दिया.
भारतीय सड़कों का बदला चेहरा
मारुति 800 के आने के बाद भारतीय सड़कों पर कारों की संख्या तेजी से बढ़ी. जहां पहले कार देखना खास बात होती थी, वहीं अब यह आम नजारा बन गया. ट्रैफिक, पार्किंग और ड्राइविंग कल्चर सब कुछ बदलने लगा. इस कार ने न सिर्फ व्यक्तिगत परिवहन को बढ़ावा दिया, बल्कि ऑटो इंडस्ट्री में प्रतिस्पर्धा भी तेज की. दूसरी कंपनियों को भी सस्ती, किफायती और भरोसेमंद कारें बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा.
एक आइकन, जो यादों में जिंदा है
समय के साथ तकनीक बदली, सेफ्टी और फीचर्स के नए मानक आए और मारुति 800 ने धीरे-धीरे सड़कों से विदा ले ली. लेकिन इसकी यादें आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में जिंदा हैं. कई घरों में यह कार परिवार के सदस्य की तरह थी, जिसे बेचते वक्त आंखें नम हो जाती थीं. मारुति 800 ने भारत को सिर्फ एक कार नहीं दी, बल्कि कार खरीदने की परिभाषा बदल दी. इसने साबित किया कि सही सोच, सही कीमत और भरोसे के साथ कोई भी प्रोडक्ट समाज की तस्वीर बदल सकता है.

