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बढ़ती गर्मी से निपटने के लिए सिंगापुर का 19वीं सदी वाला कूलिंग सिस्टम तकनीक फिर चर्चा में, जानिए पूरी जानकारी

Aman Shanti .In
By Aman Shanti .In On June 14, 2026
2 min read 1.2k views
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  • पानी की अधिक खपत, उच्च लागत इसकी प्रमुख चुनौतियां।

Singapore Cooling Technology: सिंगापुर के उत्तर-पूर्वी इलाके पंगगोल के नीचे एक बेहद खास भूमिगत सिस्टम काम कर रहा है जो करीब 5 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए ठंडा पानी इमारतों तक पहुंचाता है. 2025 में प्रति व्यक्ति GDP के हिसाब से दुनिया के दूसरे सबसे अमीर देश माने जाने वाले सिंगापुर में यह आधुनिक नहीं बल्कि पुरानी तकनीक पर आधारित व्यवस्था तेजी से फैल रही है.

क्या है District Cooling सिस्टम?

इस तकनीक को डिस्ट्रिक्ट कूलिंग कहा जाता है. इसमें एक केंद्रीय प्लांट में पानी को ठंडा किया जाता है और फिर उसे भूमिगत पाइपों के जरिए आसपास की इमारतों तक भेजा जाता है. यह पानी इमारतों के अंदर हवा को ठंडा करने में मदद करता है और फिर वापस प्लांट में लौटकर दोबारा ठंडा किया जाता है.

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह पारंपरिक एयर कंडीशनिंग की तुलना में कम बिजली खर्च करता है जो सिंगापुर जैसे देश के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि वह अपनी ज्यादातर ऊर्जा आयात करता है.

तेजी से फैलता नेटवर्क और बड़े प्रोजेक्ट

सिंगापुर में इस तरह के सिस्टम कम से कम आठ अलग-अलग जिलों में लगाए जा चुके हैं. मरीना बे का डिस्ट्रिक्ट कूलिंग प्लांट जो 2006 में शुरू हुआ था दुनिया का सबसे बड़ा भूमिगत कूलिंग नेटवर्क माना जाता है. अब कई नई इमारतों को भी इस सिस्टम से जोड़ा जा रहा है और नए प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है.

ENGIE जैसी बड़ी कंपनियां भी इस क्षेत्र में एक्टिव हैं. पंगगोल में इनके दो सिस्टम लगभग 8,000 सरकारी आवासों को ठंडक पहुंचा रहे हैं.

बढ़ती गर्मी और बिजली खपत बड़ी चुनौती

सिंगापुर में तापमान वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी तेजी से बढ़ रहा है जिससे एयर कंडीशनिंग की मांग लगातार बढ़ रही है. हालांकि AC लोगों को राहत देता है लेकिन इससे बिजली की खपत और कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ता है जिससे एक तरह का “ऊर्जा चक्र” बन जाता है.

इसी समस्या को देखते हुए सरकार ने सरकारी इमारतों और घरों में तापमान लगभग 25 डिग्री सेल्सियस रखने की सलाह दी है.

बड़ा निवेश और जलवायु रणनीति

सिंगापुर सरकार ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए करीब 100 अरब सिंगापुर डॉलर (लगभग 77 अरब अमेरिकी डॉलर) का लंबी अवधि का निवेश किया है. डिस्ट्रिक्ट कूलिंग को इसी व्यापक योजना का हिस्सा माना जा रहा है.

19वीं सदी से जुड़ी है यह तकनीक

दिलचस्प बात यह है कि इस तकनीक की जड़ें 19वीं सदी तक जाती हैं. सबसे शुरुआती डिस्ट्रीक्ट कूलिंग सिस्टम 1889 में अमेरिका के डेनवर शहर में अमोनिया या ब्राइन सॉल्यूशन के जरिए बनाया गया था.

ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, यह तकनीक बिजली की खपत को 30% से 50% तक कम कर सकती है हालांकि इसे विकसित करने में भारी लागत लगती है.

चुनौतियां भी कम नहीं

इस सिस्टम की अपनी सीमाएं भी हैं. इसे चलाने के लिए काफी मात्रा में पानी की जरूरत होती है जो आगे चलकर जल संकट और डेटा सेंटर जैसे बड़े उपभोक्ताओं के साथ प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकता है.

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Satish Kumar एक डिजिटल कंटेंट क्रिएटर और न्यूज़ पब्लिशर हैं। ये Sarkari Yojana, Technology News और Automobile Updates पर लेख लिखते हैं। इनके लेखों का उद्देश्य लोगों को सही और तेज जानकारी देना है।