भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े 9 पवित्र स्थल, जानिए जन्म से लेकर वैराग्य तक की यात्रा?

सतीश कुमार
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भगवान श्रीकृष्ण को याद करने पर दिमाग में जो सबसे पहले छवि बनती है, वो कुछ इस तरह है कि, सुंदर नयन, नील वर्ण, मधुर मुस्कान, माथे पर सुशोभित मोर पंख, हाथों में बांसुरी और मन मोह लेने वाला निराला रूप जो उन्हें भगवान से ज्यादा सखा बताता है.

महाभारत और पुराणों के मुताबिक, कृष्ण का जीवनकाल 125 वर्ष का था. अपने जीवनकाल के दौरान वे शायद ही कभी एक स्थान पर लंबे समय तक रहे हों.  उनका जीवन अलग-अलग चरणों में बीता. 

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जहां बचपन में खतरे के माहौल को देखते हुए छिपकर बिताया गया बचपन, प्रेम और विरह से भरा यौवन काल का समय, जिम्मेदारियों से भरा वयस्क जीवन और आखिर में वैराग्य और एकांत वास, हर चरण किसी न किसी स्थान से जुड़ा था, और जब वह चरण समाप्त होता, तो कृष्ण उस स्थान को छोड़ देते. आइए जानते हैं भगवान कृष्ण से जुड़े वो 9 स्थान जहां आज भी कृष्ण की यादें जुड़ी है. 

मथुरा जन्म और खतरा

भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में राजनीतिक आतंक के दौर में हुआ था. कंस के भयावह शासन ने मथुरावासियों के दिल में डर पैदा कर दिया था. जेल में कृ्ष्ण का जन्म कंस के दमन का प्रतीक था. मथुरावासी कृष्ण को बाल रूप में याद करते हैं, जिसने असंभव परिस्थितियों का सामना कर कंस पर विजय प्राप्त की थी.

यद्यपि कृष्ण शिशु अवस्था में और बाद में युवावस्था में थोड़े समय के लिए ही यहां रहे, मथुरा उनके जीवन की शुरुआत और नैतिक नींव का प्रतीक है. इसे उस स्थान के रूप में याद किया जाता है, जहां नियति ने इतिहास में प्रवेश किया.

गोकुल प्रारंभिक जीवन (0-3 वर्ष)

गोकुल में श्रीकृष्ण ने अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष को व्यतीत किया था. गोकुल उनके लिए पहचान से ज्यादा जीवन रक्षा के लिए महत्व रखता था. कंस से छिपकर श्रीकृष्ण अपने शाही जन्म से अनभिज्ञ होकर बड़े हुए. गोकुलवासी उन्हें समुदाय द्वारा संरक्षित बालक के रूप में याद करते हैं.

इस चरण ने कृष्ण को मानवीय संबंधों से परिचित कराया. गोकुल को कृष्ण के जीवन से जुड़े पालन-पोषण, सुरक्षा और सामूहिक देखभाल के रूप में याद किया जाता है.

वृंदावन बचपन से लेकर युवावस्था (3-11)

वृंदावन भगवान श्रीकृष्ण के लिए जीवन का सबसे लंबा और भावनात्मक रूप से सबसे यादगार दौर है. यहीं उनका बचपन और युवावस्था का सफर बीता था. धरती, जानवरों और लोगों से उनके गहरे भावनात्मक संबंधों ने प्रेम और विरह के प्रति उनकी समझ को आकार देने का काम किया.

जब कृष्ण ने वृंदावन छोड़ा तो, यह विरह स्थायी हो गया. यही विरह कृष्ण से जुड़ी यादों का केंद्र बन गया. वृंदावन उन्हें वापसी के माध्यम से नहीं, बल्कि उनकी यादों के लिए तड़प के जरिए से याद करता है. 

मथुरा वापसी और कंस के अत्याचारों का अंत ( उम्र 11-12)

कृष्ण भगवान जब युवावस्था में आए तो कंस का सामना करने के लिए मथुरा लौटे. मथुरा शहर उन्हें कंस के अत्याचारों के अंत करने वाला मुक्तिदाता के रूप में भी याद करता है.

उनका प्रवास संक्षिप्त था, क्योंकि उनकी भूमिका खास थी. न्याय बहाल होने के बाद वे फिर मथुरा की ओर चले गए. मथुरा भावनात्मक जीवन से राजनीतिक उत्तरदायित्व की ओर संक्रमण का प्रतीक है. 

भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े 9 पवित्र स्थल, जानिए जन्म से लेकर वैराग्य तक की यात्रा?

द्वारका राजशाही और शासन (12 से 90 वर्ष)

कृष्ण भगवान का सबसे लंबा निवास स्थान द्वारका था. द्वारका में कृष्ण राजा, रणनीतिकार और रक्षकके रूप में जीवन व्यतीत किया. द्वारका में उनका जीवन विस्तार पर केंद्रित नहीं,बल्कि स्थिरता पर केंद्रित था.

द्वारका में श्रीकृष्ण को ऐसे राजा के रूप में याद किया जाता है, जिसने अपनी प्रजा पर अंहकार रहित शासन किया. जब यादव वंश आंतरिक कलह की वजह से नष्ट हो गया, तभी कृष्ण ने हस्तक्षेप नहीं किया.

कुरुक्षेत्र मार्गदर्शन और दर्शन (करीब 90 ईस्वी)

कुरुक्षेत्र कृष्ण के ज्ञान को दर्शाता है. उन्होंने युद्ध में हिस्सा नहीं लिया फिर भी उनके परामर्श ने युद्ध परिणाम को प्रभावित किया. भगवद् गीता का जन्म इसी पल में हुआ, जो कर्म और वैराग्य को जोड़ती है.

कुरुक्षेत्र कृष्ण के संपूर्ण जीवन को कर्तव्य के दर्शन में समेटता है. कुरुक्षेत्र को उस स्थान के रूप में याद किया जाता है, जहां कृष्ण ने जीवन का सार समझाया था. 

हस्तिनापुर कुटनीति और गवाही

हस्तिनापुर कृष्ण की मध्यस्थ भूमिका को दर्शाती है. उन्होंने महाभारत यु्द्ध को रोकने की कोशिश की और विजय से ज्यादा शांति को महत्व दिया. जब युद्ध जरूरी हो गया, तो उन्होंने मानवीय हस्तक्षेप को स्वीकार किया. हस्तिनापुर कृष्ण को शासक के रूप में नहीं, बल्कि एक नैतिक साक्षी के रूप में याद करता है. यह जगह उनकी करुणा को दैवीय हस्तक्षेप की सीमाओं से जोड़ता है. 

प्रभास पाटन वापसी और मृत्यु (अंतिम वर्ष)

भगवान कृष्ण का जीवन प्रभास पाटन में सत्ता और जनसमूह से दूर समाप्त हुआ. उनकी मृत्यु शांत, निर्विरोध और एकांत में हुई. यह स्थान कृष्ण को ऐसे व्यक्तित्व के रूप में याद करता है, जिन्होंने मृत्यु को बिना किसी डर के स्वीकार किया. प्रभास पाटन उनकी सांसारिक यात्रा की समाप्ति और वैराग्य के अंतिम चरण का प्रतीक है. 

जगन्नाथ पुरी

जगन्नाथ पुरी काल से परे कृष्ण का प्रतिनिधित्व करते हैं. परंपरा के मुताबिक, उनका हृदय विद्यमान रहा और बाद में भगवान जगन्नाथ बन गया. बाकि मंदिरों के विपरीत यहां उनका स्वरूप पूर्णता के बजाय निरंतरता पर बल देता है.

पुरी कृष्ण को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद नहीं करता, जो जीवत रहे या मर गए, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद करता है जो विद्यमान रहे. यह वह स्थान है जहां स्मृति उपस्थिति में बदल जाती है.

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Satish Kumar Is A Journalist With Over 10 Years Of Experience In Digital Media. He Is Currently Working As Editor At Aman Shanti, Where He Covers A Wide Variety Of Technology News From Smartphone Launches To Telecom Updates. His Expertise Also Includes In-depth Gadget Reviews, Where He Blends Analysis With Hands-on Insights.