सफेद दाग का आयुर्वेदिक समाधान! मेलानोग्रिट से विटिलिगो और ल्यूकोडर्मा का जड़ से उपचार

सतीश कुमार
7 Min Read


Health News: मेलानिन हमारे शरीर के लिए एक अति महत्वपूर्ण रंजक (Pigment) है जो त्वचा को उसका रंग देने के साथ-साथ ही सूर्य की पराबैंगनी किरणों से भी बचाव करता है. मेलानिन  की मात्रा सभी के शरीर में अलग-अलग होती है, यह भूमध्य रेखा के आसपास रहने वाले देशो के लोगो में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, वहीं दूसरी ओर जैसे-जैसे हम ध्रुवीय क्षेत्र की ओर बढ़ते है यह मात्रा कम होती जाती है. मेलानोसाइट्स कोशिकाएं ही मेलानिन बनाती है. प्याज़ की तरह त्वचा की भी कई परतें हैं.

त्वचा की तीन परतें हैं, सबसे ऊपरी परत एपिडर्मिस, बीच की परत को डर्मिस और सबसे निचली परत को हाइपोडर्मिस कहते हैं. मेलानिन त्वचा की ऊपरी परत, एपिडर्मिस और मध्यम परत डर्मिस के जोड़ पर बनती है. एपिडर्मिस में केरोटोनोसाइट्स और मेलानोसाइट्स सामान्य रूप से पाए जाते हैं. मेलानोसाइट्स कोशिकाओं में मेलानोसोम होते हैं जो मेलानिन बनाते हैं. यह मेलानिन केराटिनोसाइट्स कोशिकाओं के माध्यम से पूरे शरीर में फैल जाते हैं जो हमारे शरीर को सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाते हैं.

विटिलिगो में शरीर पर सफेद धब्बे और मेलानिन उत्पादन में कमी

विटिलिगो, ल्यूकोडर्मा, सफ़ेद दाग या धब्बे, और श्वेत कुष्ठ एक शारीरिक बीमारी होने के साथ ही समाज में एक कलंक के रूप में भी विद्यमान है जिसमें रोगी के हाथ और पैरो पर सफ़ेद चकत्ते हो जाते हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार हर सौ में से एक व्यक्ति को विटिलिगो की बीमारी है. इस रोग में व्यक्ति के शरीर पर छोटे-छोटे सफ़ेद चकत्ते या बड़े-बड़े सफ़ेद धब्बे हो जाते है. इस बीमारी में शरीर में मेलानोसाइट्स कोशिकाएं मर जाती है और मेलानिन का उत्पादन होना समाप्त जाता है. कुछ रोगियों के हाथो में सूजन के साथ-साथ त्वचा लाल और खुरदुरी भी हो जाती हैं.

विटिलिगो और ल्यूकोडर्मा: कारण, अंतर और आधुनिक उपचार के दुष्परिणाम

आम बोलचाल की भाषा में विटिलिगो और ल्यूकोडर्मा को एक ही बीमारी माना जाता है, परन्तु ल्यूकोडर्मा किसी दुर्घटना की वजह से होने वाली बीमारी है जबकि विटिलिगो एक प्रकार की ऑटो इम्यून डिजीज है. ल्यूकोडर्मा में त्वचा में किसी प्रकार की चोट का लगना जरूरी है वहीं दूसरी ओर विटिलिगो हार्मोनल डिस्बैलेंस, डीओडरंट, परफ्यूम या किसी केमिकल पदार्थ की वजह से होने वाली एलर्जी, बार – बार पीलिया या टाइफाइड होने, कोई अधिक संवेदनशील घटना, या फिर काफी लम्बे समय से चले आ रहे एंटी बायोटिक दवाइयों के प्रयोग से भी हो सकता है.

वहीं कई बार इम्यून सिस्टम खुद में अनजाने में मेलानोसाइट्स को ख़त्म करना शुरू कर देता है. दोनों का उपचार भी लगभग एक प्रकार से ही होता है क्योंकि दोनों में ही पिगमेंटेशन और इम्युनिटी वर्धक दवाइयां दी जाती है, इसलिए इसमें अंतर बताना और भी कठिन हो जाता है.

आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों में दिया जाने वाला उपचार ज़्यादातर स्टेरॉयड के रूप में होता है या रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए दिया जाता है. इन दवाइयों के शरीर पर दुष्परिणाम भी बहुत अधिक होते हैं. इनसे कई बार स्किन के सेल्स मरने शुरू हो जाते हैं, या फिर त्वचा पर अधिक बाल आने लगते हैं, कई बार त्वचा कर रंग तो ठीक हो जाता है लेकिन उनमें झुर्रिया पड़ जाती है और कई बार धूप में जाने पर जलन भी होने लगती है.

कोशिकाओं और मेलानिन उत्पादन को बढ़ाने में आयुर्वेदिक अनुसंधान

आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथो के आधार पर निर्मित इस औषधि की जड़ी-बूटियों को प्रमाणित करने के लिए सर्वप्रथम हाई परफॉरमेंस लिक्विड क्रोमैटोग्राफी तकनीक के माध्यम से यह देखा गया कि वह कौन से सिग्नेचर फाइटोमेटाबोलाइट हैं जो सीधे तौर पर मेलेनिन को ठीक करने में मददगार है और उनका स्टैंडर्डाइजेशन किया गया. इस प्रक्रिया का प्रथम उद्देश्य उन तत्वों की खोज करना था जो आयुर्वेद ग्रंथो के अनुसार इन बिमारियों में लाभदायक हैं, द्वितीय यह भी सुनिश्चित करना जरूरी था कि जो भी आयुर्वेदिक औषधि निर्मित हो रही हो उसमें वह सभी तत्व सही मात्रा में विधमान रहे.

तत्पश्चात, कोशिकाओं पर परिक्षण के लिए प्रयोगशाला में ऊतकों का निर्माण किया गया और यह देखा गया कि इस दवाई से त्वचा पर किसी प्रकार कि कोई हानि तो नहीं हो रही है. 100 माइक्रोग्राम/एमएल की मेलानोग्रिट डोज़ के साथ भी यह देखा गया कि इन कोशिकाओं को कोई हानि तो नहीं हो रही है. उसके बाद यह भी देखा गया है कि मेलानोग्रिट देने के बाद इन कोशिकाओं के अंदर मौजूद फाइबर जैसे स्ट्रक्चर्स जिन्हें डैंड्राइट्स कहा जाता है में भी विस्तार हो रहा है. यह डैंड्राइट्स तय करते हैं कि वह कहां तक अपनी कनेक्टिविटी बना पाते हैं, जिससे कि एक कोशिकाओं से दूसरी कोशिकाओं तक मेलानिन पहुंचाया जा सके.

मेलानोग्रिट से त्वचा रंग और कोशिका स्वास्थ्य सुधार

इसके बाद एक और शोध के द्वारा मेलानोग्रिट की प्रमाणिकता की पुष्टि की गई, इसके लिए अल्फा – एमएसएच (अल्फ़ा – मेलानिन स्टिमुलेटिंग हार्मोन), जो कि एक प्रकार का हार्मोन है और आयुर्वेदिक हर्बल औषधि मेलानोग्रिट के द्वारा यह पाया गया कि अगर स्वस्थ कोशिकाओं में पहले यह हार्मोन इनड्यूस्ड किया जाये तो कोशिकाओं का रंग काला हो जाता है और फिर इस हार्मोन की मात्रा और भी कम कर दी जाये तो यह पारदर्शी जैसे हो जाते है परन्तु मेलानोग्रिट के प्रयोग से इनको फिर से उसी रूप और रंग मे किया जा सकता है जैसे वह स्वस्थ कोशकाएं हो.

उसके बाद इसके मोड ऑफ़ एक्शन को जानने की कोशिश की गई, एक एन्ज़ाइम टाइरोसिनेज़ जो एल-डोपा के लेवल को कण्ट्रोल करता है, उस पर शोध में यह पाया गया कि मेलानोग्रिट के प्रयोग से सेलुलर टाईरोसिनेज़ एक्टिविटी को भी बढ़ाया जा सकता है जो यह प्रमाणित करता है कि त्वचा कोशिकाओं के अंदर एंजाइम की कार्यशीलता बढ़ चुकी है.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

Share This Article
Satish Kumar Is A Journalist With Over 10 Years Of Experience In Digital Media. He Is Currently Working As Editor At Aman Shanti, Where He Covers A Wide Variety Of Technology News From Smartphone Launches To Telecom Updates. His Expertise Also Includes In-depth Gadget Reviews, Where He Blends Analysis With Hands-on Insights.
Leave a Comment