48 साल बाद बदले इंजन के नियम, भारत में पिस्टन रिंग के नए BIS स्टैंडर्ड लागू, अब ज्यादा माइलेज देंगी गाड़ियां!


भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में एक ऐतिहासिक बदलाव आया है. केंद्र सरकार ने इंटरनल कम्बशन इंजन (ICE) के सबसे महत्वपूर्ण पार्ट्स- पिस्टन रिंग के लिए नए स्टैंडर्ड जारी कर दिए हैं. 1977 से चले आ रहे पुराने स्पेसिफिकेशन को अब पूरी तरह अपडेट कर दिया गया है. अपडेटेड स्टैंडर्ड्स में रिवाइज्ड डायमेंशनल टॉलरेंस, मैटेरियल रिक्वायरमेंट्स और टेस्टिंग प्रोसीजर्स शामिल हैं.

ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) के इन नए नियमों का मकसद वाहनों से निकलने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करना, ईंधन की बचत बढ़ाना और भारतीय कंपोनेंट्स को ग्लोबल स्टैंडर्ड के बराबर लाना है. इस बदलाव का सीधा असर देश के तीसरे सबसे बड़े ऑटो मार्केट पर पड़ेगा, जहां अभी भी पेट्रोल-डीजल से चलने वाली गाड़ियों की संख्या सबसे ज्यादा है.

पिस्टन रिंग क्यों इतना महत्वपूर्ण है?

पिस्टन रिंग इंजन के सिलिंडर में पिस्टन की वॉल्स पर लगी ऑयल की परत को कंट्रोल करती है. ये सही मात्रा में लुब्रिकेशन बनाए रखते हुए एक्स्ट्रा ऑयल को क्रैंककेस में वापस भेजती है. इससे फ्यूल का अच्छी तरह से कंबंशन होता है, कम फ्रिक्शन होती है, ज्यादा पावर के साथ एमीशन भी कम होता है.

ट्रासपोर्ट सेक्टर भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस और पार्टिकुलेट मैटर एमीशन का करीब 14% जिम्मेदार है. ऐसे में पिस्टन रिंग के नए डायमेंशनल टॉलरेंस, मैटेरियल रिक्वायरमेंट्स और टेस्टिंग प्रोसीजर्स का अपडेट सीधे तौर पर वाहनों की एफिशिएंसी बढ़ाएगा और एमीशन को घटाएगा.

ऑटो इंडस्ट्री पर क्या असर?

बड़ी कंपनियां जैसे मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स, महिंद्रा, हुंडई और टोयोटा पहले से ही ग्लोबल स्पेसिफिकेशन्स फॉलो कर रही हैं, इसलिए उनके लिए कॉस्ट इंपैक्ट न्यूनतम रहेगा. लेकिन देश का ऑटो पार्ट्स सेक्टर (2026 में करीब 116 बिलियन डॉलर का) ज्यादातर MSME पर आधारित है. इन छोटे-छोटे मैन्युफैक्चरर्स को नए मैटेरियल, कोटिंग और टेस्टिंग इक्विपमेंट में निवेश करना होगा. हालांकि, MSMEs के लिए ये अपडेट जरूरी है. इससे उनकी प्रोडक्ट क्वालिटी सुधरेगी और वे विदेशी मार्केट में कॉम्पिटिटिव बनेंगे.

EV ट्रांजिशन के बीच ICE का ब्रिज

2025 में EV की कुल नई रजिस्ट्रेशन में सिर्फ 8% हिस्सा था,जिसमें ज्यादातर टू-व्हीलर और थ्री-व्हीलर शामिल हैं. पेट्रोल-डीजल वाहन अभी भी बाजार पर राज कर रहे हैं. ऐसे में BIS का ये कदम ICE वाले वाहनों को और एफिशिएंट बनाएगा. ऑटो इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये स्टैंडर्ड EV ट्रांजिशन को सपोर्ट करेंगे, न कि रोकेंगे. MSME को स्किलिंग और फेज्ड अपग्रेड का मौका मिलेगा, जिससे लाखों जॉब्स पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा.

सस्टेनेबल मोबिलिटी की दिशा में मजबूत कदम

BIS के नए पिस्टन रिंग स्टैंडर्ड सिर्फ एक टेक्निकल अपडेट नहीं, बल्कि भारतीय ऑटो सेक्टर की सस्टेनेबिलिटी की दिशा में एक बड़ा सिग्नल हैं. इससे न सिर्फ उत्सर्जन कम होगा, बल्कि भारतीय कंपोनेंट्स ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर और मजबूती से खड़े होंगे. छोटे मैन्युफैक्चरर्स को थोड़ा निवेश करना पड़ेगा, लेकिन लॉन्ग टर्म में ये पूरी इंडस्ट्री को मजबूत और कॉम्पिटिटिव बनाएगा.



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