मेनोपॉज के बाद कई महिलाएं यह मान लेती है कि अब उन्हें गायनेकोलॉजिस्ट यानी लेडी डॉक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं है. वहीं इस उम्र में महिलाओं की नॉर्मल सोच यही होती है कि जब पीरियड्स बंद हो गए हैं तो अब जांच की क्या जरूरत है. लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यही सोच आगे चलकर गंभीर बीमारियों खासकर कैंसर की वजह बन सकती है. इसे लेकर एक्सपर्ट्स बताते हैं कि 50 की उम्र के बाद भी महिलाओं के लिए साल में कम से कम एक बार गायनेकोलॉजिस्ट से मिलना उतना ही जरूरी है, जितना कम उम्र में. डॉक्टरों का कहना है की बढ़ती उम्र के साथ शरीर में ऐसे बदलाव होते हैं, जिनकी समय पर जांच न हो तो कैंसर जैसी बीमारियां चुपचाप बढ़ सकती है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि बहुत सी महिलाएं 50 के बाद लेडी डॉक्टर से मिलना बंद कर देती है और यहीं से कैंसर की शुरुआत कैसे होती है.
उम्र बढ़ने के साथ क्यों बढ़ता है कैंसर का खतरा?
कैंसर किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में यह 50 साल के बाद ज्यादा देखने को मिलता है. उम्र बढ़ने के साथ शरीर की कोशिकाओं में धीरे-धीरे नुकसान जमा होता रहता है. कई बार शरीर इन खराब कोशिकाओं को ठीक कर लेता है लेकिन जब नुकसान ज्यादा बढ़ जाता है, तो कैंसर की शुरुआत हो सकती है. वहीं मेनोपॉज के बाद एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्तर काफी गिर जाता है. यह हार्मोनल बदलाव ब्रेस्ट कैंसर, यूटेराइन कैंसर और ओवरी कैंसर के खतरे को प्रभावित कर सकते हैं. इसके अलावा बढ़ती उम्र भी अपने आप में एक बड़ा रिस्क फैक्टर है.
50 के बाद किन कैंसर पर ज्यादा ध्यान जरूरी?
डॉक्टरों के अनुसार 50 की उम्र के बाद कुछ कैंसर ऐसे हैं, जिनकी नियमित जांच बहुत जरूरी हो जाती है. इनमें ब्रेस्ट कैंसर शामिल है. यह मेनोपॉज के बाद महिलाओं में सबसे आम कैंसर माना जाता है. फैमिली हिस्ट्री, मोटापा, शराब का सेवन और कम फिजिकल एक्टिविटी इसका खतरा बढ़ा सकती है. वहीं गायनेकोलॉजिस्ट जांच के दौरान ब्रेस्ट एग्जाम करते हैं और जरूरत पड़ने पर मैमोग्राफी की सलाह देते हैं. इसके अलावा 50 की उम्र के बाद भी सर्वाइकल कैंसर की जांच जरूरी होती है. एचपीवी टेस्ट या पैप स्मीयर से शुरुआती स्टेज में बीमारी पकड़ी जा सकती है. वही यूटेराइन कैंसर का खतरा मेनोपॉज के बाद बढ़ जाता है. खासकर उन महिलाओं में, जिन्हें मोटापा, डायबिटीज या हार्मोनल असंतुलन की समस्या हो.
मेनोपॉज के लक्षण और इलाज
मेनोपॉज आमतौर पर 45 से 55 साल की उम्र के बीच आता है. इस दौरान हॉट फ्लैशेज, रात में पसीना आना, नींद न आना, मूड स्विंग्स, वजन बढ़ाना और वैजाइनल ड्राइनेस जैसी परेशानियां आम है. गायनेकोलॉजिस्ट से मिलने पर महिलाएं इन लक्षणों को लेकर खुलकर बात कर सकती है और हार्मोनल या नॉन हार्मोनल इलाज के बारे में सही जानकारी पा सकती है.
कौन से लक्षणों को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज?
डॉक्टर सलाह देते हैं कि मेनोपॉज के बाद अगर अबनॉर्मल ब्लीडिंग, लंबे समय तक पेट फूलना, लगातार अपच, बिना वजह वजन बढ़ना या घटना जैसे लक्षण दिखे तो इन्हें उम्र का असर मानकर नजरअंदाज न करें. वहीं 50 के बाद गायनेकोलॉजिस्ट से दूरी बनाना महिलाओं की सेहत के लिए के लिए खतरे की घंटी हो सकती है. ऐसे में नियमित जांच, सही जानकारी और समय पर इलाज से न सिर्फ कैंसर का खतरा कम किया जा सकता है, बल्कि आगे के साल के लिए हेल्दी जीवन भी जिया जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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