बजट का बड़ा हिस्सा हेल्थ सेक्टर पर नहीं हो रहा खर्च, सरकार की स्वास्थ्य नीतियों पर उठे सवाल

सतीश कुमार
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स्वास्थ्य हर देश की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक होता है. एक मजबूत और स्वस्थ समाज के बिना देश की प्रगति संभव नहीं है. भारत में पिछले कुछ सालों में स्वास्थ्य सेवाओं और अस्पतालों की स्थिति सुधारने के लिए कई योजनाएं शुरू की गई हैं, लेकिन सरकारी बजट की असल तस्वीर कुछ और ही कहती है. भारत सरकार ने 2018 में स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए एक विशेष सेस (कर) लागू किया था. इसे स्वास्थ्य खर्च बढ़ाने और देश की जनता, खासकर बीपीएल (गरीब) और ग्रामीण परिवारों की स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए पेश किया गया. आम धारणा यह थी कि इस सेस से स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च बढ़ेगा और सरकार की मौजूदा स्वास्थ्य बजट का समर्थन होगा. लेकिन आंकड़े और बजट के विवरण बताते हैं कि असलियत इसके बिल्कुल उलट है.

स्वास्थ्य पर खर्च घटा, जबकि सेस वसूला जा रहा

स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए सरकार का कुल बजट खर्च अब पहले की तुलना में कम है. 2017-18 में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर खर्च कुल सरकारी खर्च का 2.4 प्रतिशत था. लेकिन 2026-27 के बजट अनुमान में यह घटकर सिर्फ 1.9 प्रतिशत रह गया है. अगर इसे जीडीपी के अनुपात में देखें, तो यह 0.28 प्रतिशत से गिरकर 0.26 प्रतिशत हो गया है. ध्यान देने वाली बात यह है कि 2026-27 में स्वास्थ्य सेस से जो पैसा इकट्ठा किया गया है,

वह स्वास्थ्य बजट के कुल खर्च का लगभग 30 प्रतिशत है यानी अगर इस सेस को निकाल दें, तो स्वास्थ्य पर खर्च कुल बजट का सिर्फ 1.3 प्रतिशत होगा, जो 2017-18 की तुलना में आधा भी नहीं है. इसका मतलब यह है कि सेस सिर्फ खर्च बढ़ाने का दिखावा कर रहा है, लेकिन असल में स्वास्थ्य पर खर्च घट रहा है. अगर सेस नहीं होता, तो स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट जीडीपी का सिर्फ 0.18 प्रतिशत होता है.

बजट के आंकड़े क्या बताते हैं?

आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि भारत सरकार का स्वास्थ्य पर वास्तविक खर्च लगातार घट रहा है, भले ही बजट में सेस के कारण थोड़ी बढ़ोतरी दिखती हो. कुल सरकारी खर्च में स्वास्थ्य का हिस्सा 2017-18 में 2.4 प्रतिशत था, जो 2026-27 में घटकर 1.9 प्रतिशत रह गया है. अगर सेस को हटाकर देखा जाए, तो यह हिस्सा और भी कम, सिर्फ 1.3 प्रतिशत है. जीडीपी के अनुपात में भी यही गिरावट नजर आती है. 0.28 प्रतिशत से घट कर 0.26 प्रतिशत हो गया है, और सेस को हटाने पर यह केवल 0.18 प्रतिशत रह जाता है. इसका मतलब है कि सेस के बावजूद स्वास्थ्य क्षेत्र को मिलने वाला वास्तविक बजट लगातार कम हो रहा है और यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के लक्ष्यों से बहुत पीछे है.

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का लक्ष्य

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुसार, 2025 तक स्वास्थ्य पर खर्च को जीडीपी का 2.5 प्रतिशत करना था. इसमें केंद्रीय सरकार का हिस्सा लगभग 0.9 प्रतिशत जीडीपी होना चाहिए था. लेकिन वर्तमान में स्वास्थ्य पर खर्च जीडीपी का सिर्फ 0.26 प्रतिशत है, यानी लक्ष्य से लगभग तीन गुना कम, अगर 2017 के समान कुल बजट का 2.4 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता, तो 2026-27 में बिना सेस के बजट लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपये होना चाहिए था. लेकिन वास्तविक खर्च सेस सहित भी केवल 1 लाख करोड़ रुपये है.

सेस का असली मकसद और कमी

विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य और शिक्षा सेस सिर्फ खर्च बढ़ाने का भ्रम पैदा करता है. सेस का पैसा मुख्य बजट के बाहर एक रिजर्व फंड में जाता है और इस पर कोई पारदर्शिता या परिणाम मापने की जरूरत नहीं होती है. 2018-19 और 2019-20 में स्वास्थ्य के लिए जो सेस वसूला गया, वह सामान्य राजस्व में चला गया. लगभग 20,600 करोड़ रुपये जो स्वास्थ्य के लिए इकट्ठा किए गए थे, उनका कोई खास इस्तेमाल नहीं हुआ.

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Satish Kumar Is A Journalist With Over 10 Years Of Experience In Digital Media. He Is Currently Working As Editor At Aman Shanti, Where He Covers A Wide Variety Of Technology News From Smartphone Launches To Telecom Updates. His Expertise Also Includes In-depth Gadget Reviews, Where He Blends Analysis With Hands-on Insights.