स्कूलों से मिटेगा जनरेशन गैप, दादा-दादी के साथ बढ़ेगा बच्चों का रिश्ता

सतीश कुमार
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आज के समय में समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है जनरेशन गैप. बदलती जीवनशैली, तेज़ तकनीक और व्यस्त दिनचर्या के कारण बच्चों और बुजुर्गों के बीच दूरी बढ़ती जा रही है. इसी दूरी को कम करने के लिए अब स्कूलों में नई पहल शुरू हो गई है. केंद्र सरकार और शिक्षा विभाग ने मिलकर बच्चों और उनके दादा-दादी, नाना-नानी के बीच रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम उठाया है.

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की गाइडलाइंस के बाद दिल्ली शिक्षा विभाग ने सभी सीबीएसई स्कूलों में ‘ग्रैंडपेरेंट्स डे’ मनाने की शुरुआत की है. इस दिन बच्चे अपने दादा-दादी या नाना-नानी के साथ स्कूल आते हैं. स्कूल परिसर में पूरे दिन खास गतिविधियां होती हैं, जिनमें बच्चे और बुजुर्ग मिलकर हिस्सा लेते हैं. इसका मकसद सिर्फ एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि दिलों की दूरी को कम करना है.

अमेरिका-कनाडा की तर्ज पर भारत में पहल

यह कॉन्सेप्ट नया नहीं है. अमेरिका, कनाडा जैसे देशों में ‘ग्रैंडपेरेंट्स डे’ या ‘ग्रैंडफ्रेंड्स डे’ काफी समय से मनाया जा रहा है. वहां इसके अच्छे नतीजे सामने आए हैं. बच्चों का अपने परिवार से जुड़ाव बढ़ा है और बुजुर्गों में अकेलेपन की भावना कम हुई है. अब भारत में भी इसी सोच को अपनाया जा रहा है, ताकि परिवार की जड़ें मजबूत हों और संस्कार पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ें.

सालभर चलेंगी जुड़ी हुई गतिविधियां

सीबीएसई का मानना है कि सिर्फ एक दिन का आयोजन काफी नहीं है. इसलिए बोर्ड ने संकेत दिए हैं कि सालभर इस सोच से जुड़ी गतिविधियां कराई जाएंगी. स्कूलों को कहा गया है कि वे पढ़ाई के साथ-साथ ऐसे कार्यक्रम रखें, जिनसे अलग-अलग पीढ़ियों के बीच बातचीत और समझ बढ़े.

दादा-दादी दिवस पर क्या-क्या होगा खास

बच्चों और दादा-दादी की साझा कहानियां
पुराने खेलों का आयोजन
सांस्कृतिक कार्यक्रम
अनुभव साझा करने के सत्र
चित्रकला और लेखन जैसी गतिविधियां
इन सबका मकसद यही है कि बच्चे अपने बुजुर्गों को समझें और उनसे सीखें.

खास दिनों पर बुजुर्गों को बुलाने की सलाह

राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक परिषद की सिफारिशों और सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के निर्देशों के तहत सीबीएसई ने ये गाइडलाइंस तैयार की हैं. स्कूलों से कहा गया है कि वे स्वतंत्रता दिवस, बाल दिवस और अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस जैसे मौकों पर भी दादा-दादी और नाना-नानी को आमंत्रित करें. इससे बच्चों और बुजुर्गों के बीच नियमित संपर्क बना रहेगा.

बच्चों में बढ़ेगा सम्मान और समझ

बोर्ड का कहना है कि जब बच्चे अपने दादा-दादी के साथ समय बिताते हैं, तो उनमें सम्मान, धैर्य और नैतिक मूल्य अपने आप विकसित होते हैं. बुजुर्गों के अनुभव बच्चों को जीवन की सही दिशा दिखा सकते हैं. इससे बच्चों की भावनात्मक समझ भी बेहतर होती है.

‘वॉकथॉन’ जैसे कार्यक्रमों की भी सलाह

सीबीएसई ने स्कूलों को यह भी सुझाव दिया है कि वे ‘वॉकथॉन’ जैसे कार्यक्रम आयोजित करें. इसमें दादा-दादी और नाती-पोते या नाना-नानी और नातिनें साथ चलें. ऐसे कार्यक्रम न सिर्फ सेहत के लिए अच्छे होते हैं, बल्कि आपसी बातचीत और हंसी-मजाक का मौका भी देते हैं.

बुजुर्गों का अकेलापन होगा कम

आज कई बुजुर्ग अकेलेपन और सामाजिक दूरी की समस्या से जूझ रहे हैं. बच्चों के साथ समय बिताने से उनका मन खुश रहता है. स्कूलों की यह पहल वरिष्ठ नागरिकों को समाज से जोड़ने में भी मदद करेगी. उन्हें लगेगा कि उनकी मौजूदगी आज भी अहम है.

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Satish Kumar Is A Journalist With Over 10 Years Of Experience In Digital Media. He Is Currently Working As Editor At Aman Shanti, Where He Covers A Wide Variety Of Technology News From Smartphone Launches To Telecom Updates. His Expertise Also Includes In-depth Gadget Reviews, Where He Blends Analysis With Hands-on Insights.