Digital Twin: वेब सीरीज Mismatched 2 का एक छोटा-सा सीन आज के दौर में सिर्फ कल्पना नहीं रह गया है. उस सीन में प्राजक्ता कोहली और रोहित सराफ का किरदार एक ऐसी AI ऐप दिखाता है जो किसी गुजर चुके इंसान की आवाज में बात कर सकती है और मैसेज भेज सकती है. कहानी आगे बढ़ते ही यह सवाल गहराता है कि अगर तकनीक हमें मृत व्यक्ति से बात करने का मौका दे दे तो यादों और भावनात्मक closure के बीच की रेखा कहां खिंचेगी?
फिक्शन से हकीकत बनती तकनीक
जहां सीरीज में इसे एक भावनात्मक दुविधा की तरह दिखाया गया, वहीं असल दुनिया तेजी से उसी दिशा में बढ़ रही है. टेक कंपनियां अब ऐसे टूल्स पर काम कर रही हैं जो किसी व्यक्ति के गुजर जाने के बाद भी उनसे संवाद का अनुभव दे सकें. परिचित आवाज़ सुनना, सलाह लेना या बातचीत जैसा अहसास ये सब अब 2026 की उभरती हुई हकीकत बनती जा रही है.
डिजिटल आफ्टरलाइफ और ग्रिफ टेक क्या है?
The Conversation की एक रिपोर्ट के मुताबिक, AI अब डिजिटल आफ्टरलाइफ की अवधारणा को संभव बना रहा है. इसे अक्सर ग्रिफ टेक कहा जाता है. इसमें AI से बने डिजिटल ट्विन या डेथबॉट शामिल होते हैं जिन्हें किसी व्यक्ति के वॉइस नोट्स, वीडियो, तस्वीरों, मैसेज और यादों पर ट्रेन किया जाता है. नतीजा होता है एक ऐसा चैटबॉट या अवतार जो बोलने के अंदाज, स्वभाव और बातचीत के तरीके की नकल करता है मानो इंसान डिजिटल रूप में अमर हो गया हो.
भावनात्मक सुकून या नई उलझन?
इस तकनीक का आकर्षण समझना मुश्किल नहीं है. किसी अपने को खो चुके परिवारों के लिए यह सुकून और जुड़ाव का एहसास दे सकती है. लेकिन इसके साथ ही कई कानूनी और नैतिक सवाल भी खड़े हो जाते हैं जैसे सहमति, डेटा का मालिकाना हक और गलत इस्तेमाल.
मौत के बाद पहचान का मालिक कौन?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी इंसान की पहचान उसकी मौत के बाद भी उसकी मानी जाती है? ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों और भारत में भी कानून अभी यह साफ नहीं करता कि आवाज, चेहरा या व्यक्तित्व किसी की संपत्ति हैं या नहीं. कॉपीराइट किताब या फिल्म जैसी रचनाओं को तो बचाता है लेकिन किसी व्यक्ति की मौजूदगी, आवाज या बोलने के अंदाज़ को नहीं. ऐसे में अगर AI किसी इंसान के जीवन से जुड़ा डेटा इस्तेमाल कर जवाब देता है तो उसका मालिक कौन होगा परिवार, वह व्यक्ति या फिर कंपनी?
भारत में क्या है स्थिति?
भारत में इस दिशा में कुछ शुरुआती कदम जरूर दिखे हैं. हाल के वर्षों में कई नामी हस्तियों ने पर्सनैलिटी राइट्स के तहत अपनी पहचान को बिना अनुमति इस्तेमाल होने से बचाने के लिए अदालतों का रुख किया है. करण जौहर, ऐश्वर्या राय बच्चन, अभिषेक बच्चन, अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ, सद्गुरु और अरिजीत सिंह जैसे सेलिब्रिटीज इसके उदाहरण हैं. हालांकि आम नागरिकों के लिए अभी ऐसी कानूनी सुरक्षा साफ तौर पर मौजूद नहीं है.
बदनामी और जवाबदेही का खतरा
एक और चिंता यह है कि AI समय के साथ बदल सकता है. अगर कोई डिजिटल ट्विन भविष्य में ऐसे विचार जाहिर करने लगे, जो असल इंसान ने कभी नहीं रखे थे, या उसका व्यवहार गलत दिशा में चला जाए, तो जिम्मेदारी किसकी होगी परिवार की, प्लेटफॉर्म की या डेवलपर्स की? इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है.
मानसिक सेहत पर भी असर
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मृत प्रियजनों के AI रूप से लगातार बातचीत करना शोक को कम करने के बजाय लंबा खींच सकता है. इससे भावनात्मक निर्भरता बढ़ सकती है और closure पाना और मुश्किल हो सकता है. इसके अलावा, जब यूजर्स ऐसे प्लेटफॉर्म्स पर अपनी निजी यादें और डेटा सौंपते हैं तो यह भी साफ नहीं होता कि कंपनी बंद होने या बिक जाने पर उस डिजिटल अवतार का क्या होगा.
बिना कानून के भरोसा कितना सुरक्षित?
जैसे-जैसे डिजिटल आफ्टरलाइफ का विचार आम होता जा रहा है, वैसे-वैसे मजबूत नियमों की कमी खतरा भी बढ़ा रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सरकारें स्पष्ट और सख्त कानून नहीं बनातीं, तब तक अपनी आवाज, यादों और पहचान को निजी कंपनियों के भरोसे छोड़ना जोखिम भरा फैसला हो सकता है. ग्रिफ टेक कुछ लोगों को राहत दे सकती है लेकिन इसमें सुकून और नियंत्रण हमेशा साथ-साथ नहीं चलते.
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