“नहं वसामि वैकुंठे न योगिनां हृदये न च।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद॥”
इस श्लोक का अर्थ है कि, ईश्वर मात्र वैकुंठ या सिद्ध योगियों के अंदर ही निवास नहीं करते, बल्कि जहां सच्ची भक्ति का पालन किया जाता है, वहां भी निवास करते हैं. जगन्नाथ स्वामी को समर्पित मंदिरों में इस सत्य को गहराई से महसूस किया जा सकता है.
पूर्वी भारत में स्थित भगवान जगन्नाथ स्वामी का मंदिर अन्य विष्णु मंदिरों से बिल्कुल अलग है. यहां अनुष्ठान जीवंत प्रतीत होते हैं, प्रतिमा निर्भीक प्रतीत होती है और श्रद्धालु दूरी बनाकर नहीं खड़े रहते. यहां आस्था व्यवस्था या आश्वासन से नहीं बल्कि श्रद्धा और भरोसे से जुड़ी है.
भक्तों द्वारा आमतौर पर स्मरण किया जाने वाला एक सामान्य अर्पण इस भावना की ओर इशारा करता है कि,
“समर्पयामि सर्वस्वं त्वयि देवं जगन्नाथ।”
हे जगन्नाथ मैं आपको सब कुछ अर्पित करता हूं.
उड़ीसा के पुरी में जगन्नाथ स्वामी की पूजा भगवान विष्णु के रूप में की जाती है, फिर भी वे पूर्णता, अनुशासन या निश्चितता की मांग नहीं करते हैं. वे केवल समर्पण और भक्ति भावना की मांग करते हैं. यही वजह है कि, लोग अक्सर यहां अपनी स्पष्ट इच्छाओं के साथ नहीं, बल्कि थके हुए हृदय और अनुत्तरित प्रश्नों के साथ आते हैं.
जगन्नाथ स्वामी की पूजा लोक के स्वामी के रूप में, न कि व्यवस्था और स्वामी के रूप में
भारत के अधिकांश विष्णु मंदिर ब्रह्मांडीय व्यवस्था पर बल देते हैं. भगवान विष्णु को संरक्षक के रूप में पूजा जाता है, जो नियमों, धर्म और संरचना के माध्यम से संतुलन लाने में मदद करते हैं. वहीं, जगन्नाथ की पूजा जनमानस के स्वामी के रूप में की जाती है. उनके नाम के शाब्दिक अर्थ पर गौर किया जाए तो सृष्टि के स्वामी, लेकिन व्यवहारिक तौर पर इसका अर्थ है वह स्वामी जो सबका है.
जगन्नाथ स्वामी की पूजा में पदक्रम का कोई स्थान नहीं है, उनसे जुड़ी अनेक परंपराओं में पुजारी, राजा, आम लोग और यहां तक कि औपचारिक सामाजिक व्यवस्था से बाहर के लोगों को एक सामान माना जाता है. जगन्नाथ स्वामी तक बौद्धिक धर्मशास्त्र या कठोर अनुष्ठानिक पूर्णता के माध्यम से नहीं पहुंचा जाता है. उनसे उपस्थिति जरिए ही पहुंचा जाता है. जो इस बात की ओर संकेत करता है कि, आस्था को अनुभव किया जाता है, न कि किसी की निगरानी में.
जगन्नाथ स्वामी के शारीरिक स्वरूप का महत्व
अधिकांश विष्णु मंदिर में उनकी मूर्ति को सटीक अनुपात और शास्त्रीय सौंदर्य के साथ तराशा जाता है. जगन्नाथ स्वामी की मूर्ति इसके विपरीत है. उनके स्वरूप की बात की जाए तो अधूरे अंग, गोल आंखें और लकड़ी का शरीर जो सौंदर्य संबंधी अपेक्षाओं के विपरीत हैं. यह इतिहास की आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक धार्मिक संदेश है.
जगन्नाथ स्वामी की पूजा समर्पण से भरी न कि लेन-देन से
कई लोग सुरक्षा, समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हुए विष्णु मंदिर जाते हैं. जगन्नथ स्वामी के भक्त भी उनकी प्रार्थना करते हैं, लेकिन उनकी प्रार्थना का भाव अलग होता है. यहां मांगने के बजाए स्वयं को भावनात्मक रूप से अर्पत करने पर बल दिया जाता है.
जगन्नाथ स्वामी की भावना सौदेबाजी नहीं है. उनके प्रति आस्था धीरे-धीरे नियंत्रण की बजाए स्वीकृति है. इससे भक्ति कमजोर नहीं, बल्कि गहरी होती है. भक्त आमतौर पर अनुभव करते हैं कि, जगन्नाथ परिणामों का भरोसा नहीं दिलाते, बल्कि अनिश्चितता के समय साथ निभाते हैं. यह भावनात्मक नजरिया प्रार्थना के अनुभव को बदल देती है.
अनुष्ठान गतिशील, लेकिन समय में स्थिरता नहीं
कई विष्णु मंदिर में अनुष्ठान निरंतरता बनाए रखने मके लिए निर्धारित पैटर्न के नियमों का पालन किया जाता है, जबकि जगन्नाथ मंदिर में गति और परिवर्तन से जीवंत हैं. यहां देवता को स्नान कराया जाता है, कपड़े पहनाए जाते हैं, विश्राम कराया जाता है, बाहर ले जाया जाता है और यहां तक कि प्रतीकात्मक रूप से उनका नवीनीकरण भी किया जाता है.
सबसे प्रभावशाली उदाहरण कि, यह विचार कि देवता भौतिक रूप में शाश्वत नहीं हैं. शरीर का प्रतिस्थापना इसलिए नहीं किया जाता क्योंकि वह टूट जाता है, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि नवीनीकरण स्वाभाविक है. यह अवधारणा किसी डर के अनित्यता का पाठ सिखाती है. भक्त यह पाठ आत्मसात करते हैं कि, परिवर्तन का मतलब हानि नहीं है, बल्कि रूपांतरण के जरिए से निरंतरता है.
जगन्नाथ तब भी सुलभ हैं जब वे दिखाई न दें
जगन्नाथ स्वामी के भक्तों का कहना है कि, शारीरिक रूप से अप्राप्य होने पर भी निकटता का अनुभव कराते हैं. ऐसे मौके भी होते हैं जब देवता प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान नहीं होते हैं और फिर भक्ति कमजोर नहीं पड़ती है. यह इस आम धारणा के उलट है कि आस्था हमेशा दर्शन पर निर्भर करती है.
जगन्नाथ स्वामी की भक्ति भक्तों को निरंतर आश्वसन की जरूरत के बिना भी उनसे जुड़े रहने का कुशल सिखाती है. यह बंधन आंतरिक रूप से विकसित होता है. समय के साथ एक शांत, मान्यताओं पर कम निर्भर और भावनात्मक रूप से परिपक्व ही आस्था का निर्माण करता है.
मंदिर का वातावरण मानवीय न कि परिपूर्ण
जगन्नाथ मंदिर आमतौर पर गहन भीड़भाड़, शोरगुल से भरे और भावनात्मक रूप से आवेशित होते हैं. इनका उद्देश्य मौन या सौंदर्यपूर्ण शांति प्रदान करना नहीं है, बल्कि ये जीवन का ही प्रतिबिंब पेश करते हैं.
यह वातावरण एहसास कराता है कि, मंदिर कोई अलग-थलग पवित्र स्थल नहीं है. यह जीवन का ही एक विस्तृत रूप है. जगन्नाथ धाम में भक्तों पर आध्यात्मिक व्यवहार करने का कोई दबाव नहीं है. उन्हें मानवीय होने की स्वतंत्रता महसूस होती है. संस्थागत धर्म में ऐसी स्वतंत्रता दुर्लभ है और यही वजह है कि, जगन्नाथ मंदिर इतना गहन भावनात्मक प्रभाव छोड़ते हैं.
समुदाय को प्राथमिकता, व्यक्तिगत गौण
अन्य विष्णु मंदिरों में विष्णु की पूजा में आमतौर पर व्यक्तिगत मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति पर जोर दिया जाता है. वहीं, जगन्नाथ की पूजा में समुदाय को ध्यान में रखा जाता है. साझा भोजन, भ्रमण, अनुष्ठान और भावनाएं इस अनुभव को परिभाषित करती है. देवता के पास अकेले नहीं जाया जाता है. यहां तक कि जब कोई भक्त चुपचाप खड़ा होता है, तब भी एक सामूहिक लय का हिस्सा होता है.
जगन्नाथ जीवन को वास्तविक रूप में स्वीकार करने का प्रतीक
जगन्नाथ मंदिरों के खास होने का शायद सबसे गहरा कारण ये है कि, वे वास्तविकता से संघर्ष नहीं करते. जीवन में दुख, कमी या अनिश्चितता से मना नहीं किया जाता. इसके बजाय ये सब भक्ति में डूबे हुए हैं.
जगन्नाथ जीवन से बचाव को प्राथमिकता नहीं देते, वे जीवन के अंदर मौजूद रहने का प्रतीक है. समय के साथ, भक्त इस सोच को अपना लेते हैं. आस्था समस्याओं से भागने के बारे में नहीं, बल्कि उनके अंदर मजबूती से खड़े रहने के बारे में ज्यादा बताती है.

