भारतीय समाज में विधवा स्त्रियों के लेकर सदियों से एक कठोर और अमानवीय सोच थोपी गई है. कई लोगों मानते हैं कि, विधवा औरत को हमेशा सफेद कपड़े पहनने चाहिए, गहने नहीं पहनने चाहिए, सौंदर्य प्रसाधन (Beauty product) का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, हंसना नहीं चाहिए, मानो पति के निधन के साथ उसका जीवन भी खत्म हो गया हो.
लेकिन सवाल यह है कि, आखिर यह नियम आए कहां से?
कथावाचक शिवम साधक महाराज कहते हैं कि, किसी भी वेद, पुराण या शास्त्र में यह कहीं भी नहीं लिखा है कि, विधवा स्त्री को श्रृंगार नहीं करना चाहिए. तो फिर समाज ने यह क्रूर परंपरा क्यों बनाई?
क्या आप भी पति को ‘Hubby’ बुलाती हैं? कथावाचक शिवम साधक महाराज से जानिए इसके पीछे का तर्क?
श्रृंगार और सुहाग में फर्क समझें
यहां लोग सबसे बड़ी गलती करते हैं कि, श्रृंगार और सुहाग को एक चीज समझ लेते हैं, जबकि ऐसा नहीं है.
सुहाग के चिन्ह जैसे-
मांग में सिंदूर
मंगलसूत्र
बिछुए
चूड़ियां (सुहाग का प्रतीक वाली)
ये विवाह और पति की उपस्थिति का प्रतीक हैं. पति के मरने के बाद ये चिन्ह न पहनना धार्मिक परंपरा का हिस्सा हो सकता है. लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं कि, स्त्री
अच्छे कपड़े पहनना छोड़ दे
गहने न पहने
खुद को सुंदर न बनाए
चप्पल, जूते, साड़ी या सजावटी वस्त्र न पहने
यह सब श्रृंगार का हिस्सा है और पूरी तरह से वैध है.
धर्म ने कभी भी इस बात का समर्थन नहीं किया कि, दुख झेलने का तरीका खुद को कुरूप बनाना है.
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पुराण क्या कहते हैं?
पुराणों में इस बात का जिक्र देखने को मिलता है कि, स्त्री का अपमान करना, उसे पीड़ा देना, उसका तिरस्कार करना पाप के समान हैं.
सोचिए जब आप किसी विधवा स्त्री से कहते हैं कि वह रंगीन वस्त्र नहीं पहने, गहने न पहने, खुश न रहे तो आप क्या कर रहे हैं?
यह धर्म नहीं, बल्कि क्रूर सामाजिक नियंत्रण है.
विधवा होना अपराध नहीं है. पति का देहांत होना स्त्री का कर्म नहीं होता, तो फिर उसके साथ इस तरह का बर्ताव क्यों किया जाता है?
विधवा स्त्री भी इंसान हैं, भावनाओं से भरी है और जीवन जीने का अधिकार रखती हैं.
कथावाचक शिवम साधक महाराज कहते हैं कि, धर्म समर्पण करना सिखाता है, न कि आत्म दमन.
असली सत्य ये है कि, विधवा स्त्री
श्रृंगार कर सकती है.
अच्छे कपड़े पहन सकती है.
सुंदर दिख सकती है.
आत्मसम्मान के साथ जीवन-यापन कर सकती है. बस सुहाग के प्रतीक नहीं पहनती बस इतना ही, बाकी सब रोकना धर्म का हिस्सा नहीं है, मानसिक हिंसा है. अगर कोई परंपरा स्त्रियों के प्रति भेदभाव की भावना को बढ़ावा देती है, तो वह परंपरा नहीं अत्याचार है.
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