पिछले कुछ महीनों से देखें तो कई कंपनियों ने 7000+ mAH की बैटरी वाले फोन लॉन्च किए हैं. Honor और Realme जैसी कंपनियां अपने फोन्स में 10,000mAh से भी बड़ा बैटरी पैक दे चुकी हैं. कई और कंपनियां भी इस राह पर जाने को तैयार हैं. दरअसल, ये कंपनियां अपने फोन में सिलिकॉन-कार्बन बैटरी पैक यूज करती हैं, जो कम स्पेस में ज्यादा एनर्जी स्टोर कर सकता है. इससे फोन का साइज बढ़ाए बिना उनमें ज्यादा कैपेसिटी दी जा सकती है. दूसरी कंपनियों से बढ़ते मुकाबले और यूजर्स के काम की चीज होने के बाद भी ऐप्पल और सैमसंग जैसी कंपनियां अभी भी लिथियम-आयन बैटरी पर टिकी हुई हैं. इन दोनों कंपनियों के लेटेस्ट और महंगे से महंगे फोन में भी अधिकतर 5,000mAh की बैटरी ही मिलती है. आज के एक्सप्लेनर में हम जानेंगे कि बाकी कंपनियों की राह पर चलते हुए सैमसंग और ऐप्पल सिलिकॉन-कार्बन बैटरी यूज क्यों नहीं कर रही हैं.
क्या होती है सिलिकॉन-कार्बन बैटरी?
सिलिकॉन-कार्बन बैटरी नई तरह की बैटरी सेल है, जो सिलिकॉन एनोड्स के साथ आती है. इसमें एनर्जी डेन्सिटी ज्यादा होती है, जिसका मतलब है कि यह कम स्पेस में ज्यादा एनर्जी स्टोर कर सकती है. ट्रेडिशनल लिथियम-आयन बैटरी की बात करें तो इनमें ग्रेफाइट एनोड होते हैं. इनकी एनर्जी डेन्सिटी 250-300 Wh/kg ग्राम होती है, जबकि इनकी तुलना में सिलिकॉन-कार्बन बैटरी 400-500 Wh/kg रेंज के साथ आती है.
बड़ी कंपनियां इसे यूज करने से हिचकिचा क्यों रही हैं?
लॉन्ग-टर्म यूज को लेकर संशय- सिलिकॉन-कार्बन बैटरी जैसे ही पुराने होने लगती है, इसकी कैपेसिटी कम होने लगती है. नई बैटरी की कैपेसिटी भले ही शानदार लगे, लेकिन इंजीनियरों ने पाया कि 1-2 साल के बाद इनकी कैपेसिटी तेजी से कम होने लगती है. दरअसल, चार्जिंग साइकिल के कारण सिलिकॉन की स्ट्रक्चर पर असर पड़ता है और यह कुछ ही समय बाद अधिक देर तक पावर को स्टोर नहीं कर पाता. सैमसंग और ऐप्पल जैसी कंपनियों के लिए ऐसी मुश्किल समस्या खड़ी कर सकती है क्योंकि ये कंपनियां अपने लॉन्ग-टर्म ड्यूरैबिलिटी के दावे के साथ अपने फोन बेचती हैं.
स्वैलिंग प्रॉब्लम भी चिंता का कारण- सिलिकॉन-कार्बन बैटरी को लेकर सेफ्टी चिंता भी अभी तक पूरी तरह दूर नहीं हुई है. दरअसल, सिलिकॉन एनोड फूलने पर अपने आकार से 3-4 गुना बढ़ सकते हैं. ऐसे में अगर इस बैटरी में कभी स्वैलिंग आती है तो फोन और यहां तक कि आपकी पैंट की जेब भी इसे हैंडल नहीं कर पाएगी. इसे रोकने के लिए सिलिकॉन को कार्बन के साथ मिलाया जाता है, लेकिन फिर भी कंपनियां इसकी सेफ्टी को लेकर 100 परसेंट स्योर नहीं हैं. बैटरी को लेकर सैमसंग अभी भी गैलेक्सी नोट 7 की घटनाओं को भूली नही है. इसलिए वह इस मामले में कोई रिस्क नहीं लेना चाहती. वहीं ऐप्पल भी नई टेक्नोलॉजी को लेकर सेफ खेलती है.
मैन्युफैक्चरिंग भी एक बड़ा मुद्दा- ऐप्पल हर साल 20 करोड़ से अधिक आईफोन शिप करती है. सैमसंग भी इस मामले में ज्यादा पीछे नहीं है. ऐसे में अगर ये कंपनियां अचानक से बैटरी जैसी फंडामेंटल चीज को बदलती है तो मैन्युफैक्चरिंग पर इसका असर पड़ना तय है. यह अरबों-खरबों का सौदा है और इसके लिए एकदम से मैन्युफैक्चरिंग को नहीं बदला जा सकता. सिलिकॉन-कार्बन बैटरी बनाने के लिए एडवांस्ड प्रोसेस की जरूरत पड़ती है और इन कंपनियों के लिए बड़ी मात्रा में मैटेरियल हासिल करना भी सिरदर्दी का काम बन सकता है.
रेगुलेशन भी एक कारण- फोन में लगी बैटरी सिर्फ ग्राहक और कंपनी के बीच का मामला नहीं है. इस पर रेगुलेटरी और कानूनी एजेंसियों की भी नजरें होती हैं. उदाहरण के तौर पर अमेरिका में शिपिंग के लिए 20 watt-hours से अधिक वाली सिंगल बैटरी सेल को ‘डेंजरस गुड’ में गिना जाता है. ऐसे में अगर कोई बैटरी इस थ्रेसहोल्ड को पार कर जाती है तो कंपनियों को उसके लिए ज्यादा पेपरवर्क करना पड़ेगा. साथ ही इसके लिए ट्रांसपोर्ट नियम भी कड़े हो जाएंगे और इसे ट्रांसपोर्ट करने की लागत भी बढ़ेगी. इससे कंपनियों के लिए फोन शिप करना महंगा हो जाएगा और सीधा असर कीमत पर पड़ेगा. साथ ही कई देशों में सेफ थ्रेसहोल्ड से आगे जाने पर रेगुलेटरी अप्रूवल मिलना मुश्किल हो जाता है. इन सब कारणों को देखते हुए ऐप्पल और सैमसंग जैसी कंपनियां अभी तक लिथियम-आयन बैटरी पर ही टिकी हुई हैं.
तो क्या ये कंपनियां कभी सिलिकॉन-कार्बन बैटरी वाले फोन नहीं लाएंगी?
ऐसा नहीं है कि ऐप्पल और सैमसंग जैसी कंपनियां किसी नई टेक्नोलॉजी से खुद को दूर रखती हैं. हालांकि, ये बाकी कंपनियों की तुलना में थोड़ा एहतियात के साथ आगे बढ़ती हैं. फिलहाल छोटी कंपनियां अपने स्मार्टफोन्स में इस टेक्नोलॉजी को यूज कर रही हैं, जिससे रियल-वर्ल्ड एक्सपीरियंस मिल पाएगा. अगर छोटी कंपनियों की ये कोशिश सफल रहती है और सेफ्टी से जुड़ी कोई नई चिंता सामने नहीं आती है तो अगले कुछ समय में सैमसंग और ऐप्पल भी इस बैटरी टेक्नोलॉजी को अपना सकती हैं.
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