हर पैरेंट्स अपने बच्चे के लिए अच्छा ही सोचता है.कोई चाहता है कि उसका बच्चा पढ़ाई में आगे निकले, कोई चाहता है कि वह संस्कारी बने, तो कोई उसे एक सुरक्षित और सफल भविष्य देते हुए देखना चाहता है. ये सब सपने गलत नहीं हैं, लेकिन परेशानी तब शुरू होती है, जब अच्छा पेरेंट बनने की चाह परफेक्ट पेरेंट बनने की जिद में बदल जाती है. आज के समय में पैरेंट्स पर भी समाज का बहुत दबाव है. सोशल मीडिया पर हर जगह आदर्श बच्चा दिखता है. कोई 5 साल की उम्र में इंग्लिश बोल रहा है, कोई नेशनल लेवल का खिलाड़ी है, तो कोई टॉपर बनकर पैरेंट्स का नाम रोशन कर रहा है.
इन सबको देखकर कई पैरेंट्स सोचने लगते हैं, मेरा बच्चा ऐसा क्यों नहीं है और यहीं से शुरू होता है बच्चों पर अनजाने में मानसिक तनाव और प्रेशर डाला गया. अच्छे इरादे, लेकिन असर गलत, ज्यादातर पैरेंट्स का इरादा बुरा नहीं होता. वे बच्चों को बेहतर बनाना चाहते हैं, लेकिन जब उम्मीदें जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती हैं, तो वही प्यार बच्चों के लिए बोझ बन जाता है. आजकल पेरेंटिंग किताबें यूट्यूब वीडियोज और सोशल मीडिया यह दिखाते हैं कि अच्छा पेरेंट वही है जिसका बच्चा हर काम में अव्वल हो जो कभी गलती न करे, जो हमेशा कॉन्फिडेंट दिखे और जो हर जगह परफेक्ट हो इस सोच का सीधा असर बच्चों के मन पर पड़ता है.
परफेक्ट पेरेंटिंग बच्चों पर प्रेशर कैसे बन जाती है?
1. हर समय बेहतर करने की उम्मीद – जब बच्चे से हमेशा यही कहा जाता है कि इससे अच्छा कर सकते थे, अगली बार और मेहनत करना तो बच्चा अपनी छोटी-छोटी उपलब्धियों से खुश होना ही भूल जाता है. उसे लगने लगता है कि वह कभी भी पैरेंट्स की उम्मीदों पर पूरा नहीं उतर पाएगा.
2. गलती करने से डर – जब गलती को डांट या निराशा से जोड़ा जाता है, तो बच्चा सीखने से डरने लगता है. उसे लगता है अगर मैं फेल हुआ, तो सब नाराज हो जाएंगे. इस डर की वजह से बच्चे नई चीजें आजमाना छोड़ देते हैं.
3. तुलना का दबाव – देखो, शर्मा जी का बच्चा क्या कर रहा है, उसके इतने अच्छे नंबर आए हैं, ऐसी बातें बच्चों के कॉन्फिडेंस को अंदर से तोड़ देती हैं. तुलना बच्चे को यह सिखाती है कि वह जैसा है, वैसा ठीक नहीं है.
4. भावनाओं को नजरअंदाज करना – जब पैरेंट्स सिर्फ रिजल्ट, नंबर और परफॉर्मेंस पर ध्यान देते हैं, तो बच्चे की भावनाएं पीछे छूट जाती हैं. धीरे-धीरे बच्चा अपनी परेशानी छिपाने लगता है, रोना कमजोर समझने लगता है और मन की बात कहना बंद कर देता है.
5. प्यार को सफलता से जोड़ देना – अगर बच्चे को यह महसूस हो कि पैरेंट्स का प्यार सिर्फ अच्छे रिजल्ट पर मिलता है, तो वह हर समय खुद को साबित करने की कोशिश करता रहता है. ऐसे बच्चे अंदर से बहुत अकेला महसूस करते हैं.
बच्चों पर इसका लंबे समय का असर कैसे होता है
जो बच्चे लंबे समय तक दबाव में रहते हैं, उनमें चिंता और घबराहट बढ़ सकती है, कॉन्फिडेंस कमजोर हो सकता है, फैसले लेने में डर लग सकता है, रिश्तों में खुलकर बात करने में दिक्कत हो सकती है, कई बार ये असर बड़े होने के बाद भी बने रहते हैं.
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