Ghaziabad Suicide Case: बच्चों को क्यों खींच रहा कोरियन कल्चर और कहां चूक रहे हम? गाजियाबाद की घटना से उठे सवाल

सतीश कुमार
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मोबाइल स्क्रीन में डूबे बच्चे, बाहरी दुनिया से कटता बचपन और कोरियन ड्रामा एवं म्यूज़िक की बढ़ती दीवानगी. गाज़ियाबाद की हालिया घटना के बाद एक बार फिर यह सवाल तेज हो गया है कि आखिर हमारे बच्चे किस दिशा में जा रहे हैं. क्या यह सिर्फ कोरियन कल्चर का असर है, या इसके पीछे हमारी सामाजिक और पारिवारिक चूक छिपी है. इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए एबीपी लाइव की टीम ने आर्टेमिस हॉस्पिटल के मशहुर वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. राहुल चंडोक से विस्तार से बातचीत की.

कोरियन कल्चर नहीं, खालीपन बच्चों को कर रहा है आकर्षित

डॉ. राहुल चंडोक साफ कहते हैं कि यह समस्या किसी एक देश या संस्कृति की नहीं है. असल समस्या यह है कि बच्चों के लिए हमारे पास अपना कंटेंट और अपना समय नहीं है. खेलने के मैदान कम हो गए हैं. खेल और मनोरंजन की जगह मोबाइल ने ले ली है. जब बच्चों के लिए भारतीय कहानियां, नाटक और फिल्में नहीं होंगी, तो वे बाहर का कंटेंट ही देखेंगे. कोरियन कंटेंट खासतौर पर टीनएजर्स को ध्यान में रखकर बनाया जाता है, इसलिए वह उन्हें ज़्यादा आकर्षित करता है.

मोबाइल बना परिवार का नया सदस्य

डॉ. चंडोक एक सटीक उदाहरण देते हैं. आज माता-पिता बच्चे को शांत रखने के लिए सबसे पहले मोबाइल थमा देते हैं. खाना हो, चुप कराना हो या किसी से बात करनी हो, हर स्थिति में फोन सामने होता है. बच्चा छोटी उम्र से ही मोबाइल को परिवार का हिस्सा मानने लगता है. ऐसे में बड़े होने पर उससे मोबाइल छीनना बेहद मुश्किल हो जाता है.

खेल का मैदान खत्म, स्क्रीन की दुनिया शुरू

बच्चों का असली काम खेलना है. लेकिन मैदान, पार्क और कोर्ट की कमी ने बच्चों को चारदीवारी में कैद कर दिया है. वे अपने ही उम्र के बच्चों से मिल नहीं पा रहे हैं. गाज़ियाबाद की घटना में सामने आया कि बच्चे सालों तक स्कूल नहीं गए, किसी से संपर्क नहीं था और अकेलेपन ने उनकी मानसिकता पर गहरा असर डाला. दीवारों पर लिखा मिला कि वे खुद को बेहद अकेला महसूस कर रहे थे.

डिस्ट्रैक्शन और खुशी में फर्क समझना जरूरी

डॉ. चंडोक कहते हैं कि मोबाइल बच्चों को डिस्ट्रैक्ट तो करता है, लेकिन खुश नहीं करता. कार्टून या वीडियो बच्चे को कुछ देर चुप करा सकता है, लेकिन यह भावनात्मक जुड़ाव नहीं दे सकता. अकेलापन जब बढ़ता है, तो बच्चा उसी काल्पनिक दुनिया को अपनी असली दुनिया मानने लगता है.

बच्चों को कोरियन कल्चर या मोबाइल से दूर रखना है, तो सबसे पहले माता-पिता को उन्हें समय देना होगा. बच्चे के पास बैठकर मोबाइल चलाना, क्वालिटी टाइम नहीं होता. बच्चे के दिनभर की बातें सुनना, उसकी दोस्ती, झगड़े और सपनों को समझना ज़रूरी है. आज घरों में बच्चे कम हैं, और उम्र का अंतर ज़्यादा है. ऐसे में बच्चे और ज़्यादा अकेले हो जाते हैं.

अपना कंटेंट नहीं होगा तो बच्चे कहीं और जाएंगे

डॉ. चंडोक मानते हैं कि भारतीय संस्कृति के अनुरूप आधुनिक नाटक और सीरियल बहुत कम बन रहे हैं. इंटरनेट के दौर में दुनिया भर का कंटेंट बच्चों के लिए उपलब्ध है. ट्रांसलेशन ने इसे और आसान बना दिया है. अगर हमारे देश में बच्चों और किशोरों के लिए आकर्षक कंटेंट नहीं बनेगा, तो वे विदेशी कंटेंट की ओर जाएंगे ही.

सोशल मीडिया बैन नहीं, सही माहौल की जरूरत

16 साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल से दूर रखने की सलाह पर डॉ. चंडोक संतुलित राय रखते हैं. वे कहते हैं कि मोबाइल और इंटरनेट आज की ज़िंदगी का हिस्सा हैं. ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों में सोशल मीडिया पर रोक की बातें हो रही हैं, लेकिन भारत जैसे देश में समाधान बैन नहीं है. समाधान यह है कि बच्चों के लिए सही कंटेंट बनाया जाए और घर में ऐसा माहौल हो जहां बच्चे माता-पिता के साथ समय बिता सकें.

डॉ. राहुल चंडोक का मानना है कि अगर बच्चों को यह भरोसा मिल जाए कि माता-पिता उनके लिए समय निकालेंगे, तो वे खुद मोबाइल से दूरी बना लेंगे. वे पढ़ाई पूरी कर आपके पास बैठेंगे. अगर यह भरोसा नहीं होगा, तो वे रातों में जागकर मोबाइल और काल्पनिक दुनिया में जीने लगेंगे.

बच्चों को समझा तो वे अपने आप लौट आएंगे

कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि कोरियन कल्चर बच्चों की समस्या नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की कमी का आईना है. बच्चों को सही दिशा देने के लिए हमें उन्हें समय देना होगा, उनके लिए अपनी संस्कृति के अनुरूप कंटेंट बनाना होगा और मोबाइल को विकल्प बनाना होगा, सहारा नहीं. तभी बच्चे फिर से अपने माता-पिता और अपनी दुनिया की ओर लौटेंगे.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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Satish Kumar Is A Journalist With Over 10 Years Of Experience In Digital Media. He Is Currently Working As Editor At Aman Shanti, Where He Covers A Wide Variety Of Technology News From Smartphone Launches To Telecom Updates. His Expertise Also Includes In-depth Gadget Reviews, Where He Blends Analysis With Hands-on Insights.