Ramadan 2026: माह-ए-रमजान का पहला रोजा पूरा, अल्लाह की इबादत संग सहरी इफ्तार का जायका

सतीश कुमार
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Ramadan 2026: पिछले एक सप्ताह से घरों और मस्जिदों में जिस मुबारक माह की आमद की तैयारियां चल रही थी वह माह-ए-रमजान शुरू हो चुका है. सहरी-इफ्तार की लज्जत, जिक्र, शुक्र, सब्र, नेमत, रहमत, कुरआन-ए-पाक की तिलावत, नमाज का वसूल, रोजे की रूहानियत लेकर फिर आ गया है माह-ए-रमजान. चारों तरफ माह-ए-रमजान का नूर है.

 

गुरुवार की सुबह लोगों ने मिलकर सहरी खाई. तहज्जुद की नमाज पढ़ने के बाद फज्र की नमाज अदा की. कुरआन-ए-पाक की तिलावत की. तस्बीह व दुआ में अल्लाह की हम्द व सना बयान की. मस्जिदों में दरूदो सलाम पढ़ा गया. सुबह से ही लोग इबादत में जुट गए तो यह सिलसिला देर रात तक चलता रहा. शहर की हर मस्जिद में नमाजियों की भीड़ उमड़ी. घरों में महिलाओं ने नमाज पढ़ी व कुरआन-ए-पाक की तिलावत की. चूंकि रमजान के तीस दिनों को तीन हिस्सों में बांटा गया है यानी रहमत, मगफिरत, जहन्नम से आजादी. पहला अशरा रहमत का चल रहा है, इसलिए सभी अल्लाह तआला की रहमत से मालामाल होना चाह रहे हैं. 

 

जोहर की नमाज के बाद लोगों ने बाजार की तरफ रुख किया. इफ्तारी के तमाम सामानों की खरीदारी की. इसके बाद घरों में महिलाओं ने इफ्तार के विभिन्न पकवानों को बनाना शुरु किया. असर की नमाज घरों व मस्जिदों में अदा की गई. इफ्तार तैयार होने के बाद मुसाफिरों व गरीबों के लिए मस्जिदों में भेजी गई. पास पड़ोस में भी इफ्तार भेजी गई. शाम को सभी ने एक दस्तरख्वान पर इफ्तार कर, दुआ मांगी. तरह-तरह के खजूर, चिप्स, चना, पकोड़ियां व फल वगैरा ने दिन भर की भूख को गायब कर दिया.

 

इफ्तार करने के बाद छोटे से लेकर बड़ों ने मगरिब की नमाज अदा की. थोड़ा आराम किया फिर रात में इशा, तरावीह, वित्र एवं नफ्ल नमाज पढ़ी. यह नजारा पूरे माह इसी तरह बरकरार रहेगा. जाफरा बाजार, नखास, घंटाघर, रेती, शाह मारूफ वगैरा की फिजा देखते ही बन रही है. सेवईं व खजूर, सहरी-इफ्तार की दुकानें सज चुकी हैं. तरावीह की नमाज के बाद उन पर भीड़ उमड़ रही है.

 

रोजा तमाम बीमारियों का इलाज है: डॉ. सना

 

डॉ. सना सुम्बुल ने बताया कि रोजा रखने में बहुत सी हिकमतें हैं. रोजा रखने से भूख और प्यास की तकलीफ का पता चलता है. जिससे खाना-पानी की कद्र मालूम होती है और इंसान अल्लाह का शुक्र अदा करता है. रोजे से भूखों और प्यासों पर मेहरबानी का जज्बा पैदा होता है, क्योंकि मालदार अपनी भूख याद करके गरीब मोहताज की भूख का पता लगाता है. रोजे से भूख के बर्दाश्त करने की आदत पड़ती है. अगर कभी खाना मयस्सर न हो तो घबराता नहीं और अल्लाह की नाशुक्री नहीं करता.

भूख बहुत सी बीमारियों का इलाज है. रोजा बहुत सी बीमारियों का इलाज है क्योंकि इससे कुव्वते हाजमा की इस्लाह होती है. रोजा ब्लड प्रेशर, कैंसर, फालिज, मोटापा, चमडे़ की बीमारियों और भी बहुत सारी बीमारियों में फायदा बख्श है जैसा कि विशेषज्ञों का शोध है. रोजा सिर्फ इंसान ही की तरफ से अदा की जाने वाली इबादत है. फरिश्ते और दीगर मख्लूक इसमें शामिल नहीं और रोजा रखने की सबसे बड़ी हिक्मत यह है कि इससे परेहजगारी मिलती है जैसा कि अल्लाह का फरमान है.

 

जरूरतमंदों की मदद करें : उलमा किराम शाही जामा मस्जिद तकिया कवलदह के इमाम हाफिज आफताब आलम ने बताया कि रमजान का पवित्र महीना इबादत और आत्म-संयम का समय है. रोजा रखने का मुख्य उद्देश्य अल्लाह के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना, आत्म-अनुशासन सीखना और भूख-प्यास का अनुभव करके जरूरतमंदों के प्रति सहानुभूति महसूस करना है. रमजान में नेक काम और दान-पुण्य का सवाब कई गुना बढ़ जाता है. रोजा इंसान को बुराइयों से रोकता है और परहेजगार बनाता है. अपनी खुशियों में दूसरों को शामिल करें। नेकी के काम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें. जरूरतमंदों की जरूरत पूरी करें. भूखों को खाना खिलाएं, कपड़ा पहनाएं. मखलूक पर रहम करें. 

मुफ्ती-ए-शहर अख्तर हुसैन मन्नानी ने कहा कि रोजा पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है, वजन कम करता है, ब्लड शुगर और बीपी नियंत्रित करता है और शरीर को डिटॉक्सिफाई  करता है. खुश दिली से रोजा रखें और अल्लाह के इनाम के हकदार बनें. खूब इबादत करें और इस माह-ए-रमजान के फैज से मालामाल हों. जरूरतमंदों व पड़ोसियों, यतीमों, बेवाओं का खास ख्याल रखें  हर मुमकिन मदद करें.

बरकाती मकतब पुराना गोरखपुर के वरिष्ठ शिक्षक हाफिज रजी अहमद बरकाती ने कहा कि रोजा इस्लाम में एक प्रमुख इबादत है, जो परहेजगारी सिखाता है और रूहानी व जिस्मानी फायदे देता है. यह गुनाहों से सुरक्षा, सब्र, और रूहानी मजबूती का जरिया है. इस्लाम में रोजा रखने की बहुत अधिक फजीलत बयान की गई है. यह न केवल अल्लाह की इबादत है, बल्कि इंसान के रूहानी और जिस्मानी सुधार का भी जरिया है. रोजा इंसान को अपनी ख्वाहिशात पर काबू पाना सिखाता है. 

 

इस्लामिक स्कॉलर कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने बताया कि रोजा कैंसर, शुगर, और दिल की बीमारियों के खतरे को कम करता है. रोजा रखने से शरीर का पाचन तंत्र सुधरता है और शरीर से जहरीले पदार्थ बाहर निकलते हैं. रोजा याददाश्त और एकाग्रता बढ़ाने में मददगार साबित हुआ है. इस माह में नेकी करने वालों को बहुत अधिक सवाब मिलता है. रोजेदार अपनी दिनचर्या में अधिक से अधिक अल्लाह की इबादत और जकात व अन्य सदका खैरात करें.

 

शहर काजी मुफ्ती मुहम्मद अजहर शम्सी ने बताया कि मुकद्दस रमजान का पहला अशरा रहमत, दूसरा मगफिरत, तीसरा जहन्नम से आजादी का है. रमजान रहमत, खैर व बरकत का महीना है. इसमें रहमत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं. जहन्नम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं. शैतान जंजीर में जकड़ दिए जाते हैं. नफ्ल का सवाब फर्ज के बराबर और फर्ज का सवाब सत्तर फर्जों के बराबर दिया जाता है. जरूरतमंदों व गरीबों की भरपूर मदद करें. लोगों के काम आएं. दीनी व सामाजिक कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें. प्रशासन का हरसंभव सहयोग करें.

 

सब्जपोश हाउस मस्जिद जाफरा बाजार के इमाम हाफिज रहमत अली निजामी ने बताया कि रोजा रखकर नमाज पढ़े. जकात दें. सदका व खैरात करें. गरीबों व जरूरतमंदों की मदद करें। दूसरों के काम आएं. मुफलिसों की मुफलिसी दूर करने में मददगार बनें.

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Satish Kumar Is A Journalist With Over 10 Years Of Experience In Digital Media. He Is Currently Working As Editor At Aman Shanti, Where He Covers A Wide Variety Of Technology News From Smartphone Launches To Telecom Updates. His Expertise Also Includes In-depth Gadget Reviews, Where He Blends Analysis With Hands-on Insights.