Why Do Teenagers Become Violent Towards Parents: लखनऊ में एक कारोबारी की सनसनीखेज हत्या के मामले में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं. पुलिस के मुताबिक, 19 वर्षीय युवक ने अपने ही पिता की गोली मारकर हत्या कर दी, फिर शव के टुकड़े कर सबूत मिटाने की कोशिश की. पुलिस ने बताया कि आरोपी अक्षत प्रताप सिंह ने 20 फरवरी को तड़के आशियाना स्थित अपने घर में पिता मंवेंद्र सिंह की हत्या की. मंवेंद्र सिंह पैथोलॉजी और शराब के कारोबार से जुड़े थे.
पुलिस की पूछताछ में अक्षत ने कबूल किया कि उसने लाइसेंसी राइफल से पिता को गोली मारी. प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि पढ़ाई और करियर को लेकर दोनों के बीच काफी समय से विवाद चल रहा था. आरोपी पर नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को लेकर दबाव था, जिससे तनाव बढ़ता गया. हत्या के बाद आरोपी ने सबूत छिपाने के लिए बेहद भयावह कदम उठाया. उसने शव के टुकड़े कर दिए. दोनों हाथ अलग किए. घुटनों के नीचे से पैर काटे और सिर धड़ से अलग कर दिया. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर बच्चे ऐसा कदम क्यों उठा लेते हैं?
बच्चे क्यों उठाते हैं ऐसा कदम?
लोगों के मन में सवाल उठने लगे हैं कि आखिर बच्चों में ऐसा क्या बदलाव होने लगा है कि वे अपने ही पैरेंट्स को मारने लगे हैं? इस सवाल के जवाब में आकाश हेल्थकेयर में सीनियर साइकेट्रिस्ट एवं चाइल्ड एंड अडोलसेंट बिहेवियर एक्सपर्ट डॉ. पवित्रा शंकर ने बताया कि अक्सर लोग यह समझते हैं कि बच्चे अचानक हिंसक हो जाते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि ऐसा व्यवहार धीरे-धीरे विकसित होता है. जब बच्चा गुस्से को कंट्रोल नहीं कर पाता और परिवार से इमोशनली दूरी बना लेता है तो सहानुभूति कम हो जाती है. इसके बाद वह छोटी-छोटी बातों पर आक्रामक प्रतिक्रिया देने लगता है, तब इसे चेतावनी संकेत माना जाना चाहिए. कई मामलों में लगातार अपमान, घरेलू तनाव, नशे का प्रभाव, मेंटल हेल्थ समस्याएं या डिजिटल कंटेंट से प्रभावित हिंसक सोच भी भूमिका निभाती हैं.
माता-पिता को कब ध्यान देना चाहिए?
डॉ. पवित्रा शंकर के मुताबिक, यदि बच्चा बार-बार ‘नफरत’, ‘बदला’ या ‘किसी को नुकसान’ जैसी बातें करने लगे, सामाजिक रूप से अलग रहने लगे या व्यवहार में अचानक बड़ा बदलाव दिखे तो माता-पिता को विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए. किशोरावस्था में बागी व्यवहार सामान्य सीमा तक स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन जब यह नियम तोड़ने से आगे बढ़कर आक्रामकता, क्रूरता या संवेदनहीनता में बदलने लगे, तब तुरंत काउंसलिंग और साइकोलॉजिकल मूल्यांकन जरूरी है. समय पर बातचीत, इमोशनल सहयोग और पेशेवर मदद ऐसी समस्याओं को काफी हद तक कम कर सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

