Brain sharp on empty stomach? फास्टिंग पर नया वैज्ञानिक खुलासा

aditisingh
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आजकल फास्टिंग सिर्फ धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रह गया है. बहुत से लोग वजन कम करने, शुगर कंट्रोल करने और फिट रहने के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग या समय-टाइम रेस्ट्रिक्टेड ईटिंग अपना रहे हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि खाली पेट रहने का असर हमारे दिमाग पर भी पड़ता है. हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों और न्यूरोलॉजिस्ट्स ने पाया है कि सही तरीके से और सीमित समय के लिए किया गया  फास्टिंग दिमाग के लिए भी फायदेमंद हो सकता है. यह सिर्फ शरीर की चर्बी कम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि दिमाग की कार्यक्षमता, याददाश्त और मानसिक स्पष्टता को भी प्रभावित कर सकता है. हालांकि, यह समझना जरूरी है कि फास्टिंग हर किसी के लिए सुरक्षित नहीं होती और इसे सोच-समझकर ही अपनाना चाहिए. तो आइए जानते हैं कि क्या सच में खाली पेट दिमाग ज्यादा बेहतर काम करता है. फास्टिंग का मानसिक असर और फायदे क्या हैं.

क्या सच में खाली पेट दिमाग ज्यादा बेहतर काम करता है?

जब हम लगभग 12 से 16 घंटे तक कुछ नहीं खाते तो शरीर में जमा ग्लाइकोजन खत्म होने लगता है. इसके बाद शरीर एनर्जी के लिए फैट जलाना शुरू करता है. इस प्रक्रिया में कीटोन बॉडीज बनती है. इनमें से एक प्रमुख कीटोन, बीटा-हाइड्रोक्सीब्यूटाइरेट, दिमाग के लिए एक अच्छा ईंधन माना जाता है. यह सिर्फ एनर्जी  ही नहीं देता, बल्कि दिमाग की कोशिकाओं को सक्रिय और मजबूत बनाए रखने में भी मदद करता है. इस बदलाव को मेटाबोलिक स्विच कहा जाता है. जब दिमाग ग्लूकोज की जगह कीटोन से एनर्जी लेने लगता है, तो कई लोगों को मानसिक स्पष्टता, बेहतर फोकस और कम थकान महसूस होती है.

फास्टिंग का मानसिक असर और फायदे क्या हैं

1. दिमाग की ग्रोथ का सहायक: फास्टिंग का एक बड़ा फायदा यह बताया जाता है कि इससे बीडीएनएफ नामक प्रोटीन का स्तर बढ़ सकता है. बीडीएनएफ नई मस्तिष्क कोशिकाओं के बनने में मदद करता है, पुरानी कोशिकाओं को सुरक्षित रखता है, सीखने और याददाश्त को बेहतर बनाता है, दिमाग को तनाव से निपटने में मदद करता है. बीडीएनएफ दिमाग के लिए खाद की तरह काम करता है, जो उसकी ग्रोथ और मजबूती में मदद करता है.

2. दिमाग की सफाई प्रक्रिया: फास्टिंग के दौरान शरीर में एक खास प्रक्रिया सक्रिय होती है, जिसे ऑटोफैगी कहते हैं. इसका मतलब खुद की सफाई है. इस दौरान कोशिकाएं अपने अंदर जमा खराब और क्षतिग्रस्त प्रोटीन को हटाने लगती हैं. यह प्रक्रिया दिमाग की सेहत के लिए खासतौर पर जरूरी मानी जाती है, क्योंकि कुछ न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों (जैसे अल्जाइमर और पार्किंसंस) में असामान्य प्रोटीन का जमाव देखा जाता है. हालांकि अभी इंसानों पर और बड़े अध्ययन की जरूरत है, लेकिन शुरुआती शोध बताते हैं कि ऑटोफैगी लंबे समय में दिमाग की सुरक्षा में मदद कर सकती है.

3. साफ और स्थिर एनर्जी: जब दिमाग कीटोन से एनर्जी लेता है, तो वह कम ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा करता है. ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस वह स्थिति है, जो उम्र बढ़ने और मानसिक कमजोरी से जुड़ी होती है. कीटोन से मिलने वाली एनर्जी ज्यादा स्थिर होती है और अचानक थकान कम कर सकती है. ब्रेन फॉग यानी दिमागी धुंध को कम करने में मदद कर सकती है. इसी कारण कुछ लोग फास्टिंग के दौरान ज्यादा फोकस और स्पष्ट सोच महसूस करते हैं.

4. मेटाबोलिक सेहत और दिमाग: समय-सीमित खाने से जुड़े कई अध्ययनों में पाया गया है कि इससे इंसुलिन संवेदनशीलता बेहतर होती है, शरीर में सूजन कम हो सकती है, मेटाबोलिक लचीलापन बढ़ता है. शुगर और मेटाबोलिक गड़बड़ी का संबंध दिमागी गिरावट से भी जोड़ा जाता है, इसलिए ये बदलाव अप्रत्यक्ष रूप से मस्तिष्क की सेहत को फायदा पहुंचा सकते हैं.

इन बातों का रखें ध्यान

फास्टिंग हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं होती, खासकर डायबिटीज के मरीज, खाने के विकार से जूझ रहे लोग प्रेग्नेंसी और ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली महिलाएं, बुजुर्ग और कमजोर लोग, जो लोग शुगर कम करने वाली दवाएं लेते हैं.ऐसे लोगों को फास्टिंग शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए. इसके अलावा, लंबे समय तक दिमाग पर पड़ने वाले प्रभावों की पुष्टि के लिए अभी और बड़े वैज्ञानिक अध्ययनों की जरूरत है.

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Satish Kumar Is A Journalist With Over 10 Years Of Experience In Digital Media. He Is Currently Working As Editor At Aman Shanti, Where He Covers A Wide Variety Of Technology News From Smartphone Launches To Telecom Updates. His Expertise Also Includes In-depth Gadget Reviews, Where He Blends Analysis With Hands-on Insights.