US Auto Industry War Mode? GM और Ford को हथियार बनाने का ऑफर, WWII जैसा बड़ा कदम!


ऑटोमोबाइल सेक्टर की दुनिया में एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है. वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी पेंटागन के सीनियर डिफेंस अधिकारी जनरल मोटर्स (जीएम) की सीईओ मैरी बैरा और फोर्ड मोटर के सीईओ जिम फार्ले से सीधे संपर्क में हैं.

बातचीत का मकसद है दोनों कंपनियों की फैक्टरियों को हथियार, गोला-बारूद और मिलिट्री सप्लाई के प्रोडक्शन में शामिल करना. ये द्वितीय विश्व युद्ध (WWII) के बाद पहली बार हो रहा है, जब अमेरिका की दो सबसे बड़ी ऑटो कंपनियां पूर्ण रूप से हथियार निर्माण की ओर मुड़ सकती हैं.

ट्रंप प्रशासन क्यों इस कदम पर मजबूर?

ईरान और यूक्रेन में चल रहे संघर्षों ने अमेरिकी डिफेंस स्टॉक को तेजी से खत्म कर दिया है. गोला-बारूद, मिसाइलें और मिलिट्री व्हीकल्स की मांग इतनी बढ़ गई है कि पारंपरिक डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर्स (लॉकहीड मार्टिन, बोइंग जैसी कंपनियां) अकेले सप्लाई नहीं कर पा रहे. ट्रंप प्रशासन का मानना है कि अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग बेस को बड़ा करना जरूरी है. ऑटो इंडस्ट्री की मास प्रोडक्शन क्षमता, विशाल फैक्टरियां, सप्लाई चेन और स्केलिंग एक्सपर्टीज का फायदा उठाकर प्रोडक्शन को कई गुना बढ़ाया जा सकता है.

क्या Ford और GM वाकई हथियार बना सकेंगी?

इसका जवाब है बिल्कुल हां. दोनों कंपनियां पहले भी ये कर चुकी हैं और उनकी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता आज भी दुनिया में बेमिसाल है. फोर्ड की फैक्टरियां पहले ही मिलिट्री व्हीकल पार्ट्स सप्लाई करती हैं, जबकि जीएम के पास GM Defense नाम का डिवीजन है, जो इन्फैंट्री स्क्वाड व्हीकल्स बनाता है.

इनकी फैक्टरियों में ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और जस्ट-इन-टाइम प्रोडक्शन सिस्टम पहले से मौजूद है, जो हथियारों की बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग के लिए परफेक्ट है. अगर जरूरत पड़ी तो सिविलियन कार लाइन को अस्थायी रूप से रोककर हथियार लाइन लगाई जा सकती है. ठीक वैसे जैसे WWII में किया गया था.

ये पहली बार नहीं हो रहा

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान फोर्ड और जीएम ने अमेरिका को ‘आर्सेनल ऑफ डेमोक्रेसी’ बनाने में अहम भूमिका निभाई थी. फोर्ड ने मिशिगन के विलो रन प्लांट में दुनिया का सबसे बड़ा फैक्टरी कॉम्प्लेक्स बनाया था, जहां B-24 लिबरेटर बॉम्बर का प्रोडक्शन एक घंटे में एक प्लेन की रफ्तार से होता था. 1942 से 1945 तक फोर्ड ने 8,685 नए B-24 बॉम्बर बनाए थे, जो कुल B-24 प्रोडक्शन का आधा से ज्यादा है. उस समय पैसेंजर कार प्रोडक्शन पूरी तरह बंद कर दिया गया था.

जीएम ने इससे भी ज्यादा योगदान दिया. कंपनी ने 8,50,000 से ज्यादा मिलिट्री ट्रक्स, 38,000 टैंक्स और टैंक डिस्ट्रॉयर्स, 1.9 मिलियन मशीन गन्स, 11 करोड़ आर्टिलरी शेल्स और एयरक्राफ्ट इंजन बनाए. जीएम उस समय दुनिया की सबसे बड़ी मिलिट्री कॉन्ट्रैक्टर बन गई थी, जिसने 123 अरब डॉलर (आज के मूल्य में कई गुना ज्यादा) का वॉर मैटेरियल सप्लाई किया. 1942 से 1945 तक दोनों कंपनियों की कोई भी फैक्टरी सिविलियन कार नहीं बना पाई थी. सब कुछ वॉर इफर्ट के लिए था.

‘वार फैक्टरी’ बन जाएगी US ऑटो इंडस्ट्री!

WWII की याद दिलाती ये पहल दिखाती है कि अमेरिकी ऑटो इंडस्ट्री न सिर्फ सड़क, बल्कि युद्ध के मैदान में भी मजबूत है. आगे की डेवलपमेंट्स पर नजर रखना जरूरी होगा. क्या ये सिर्फ बातचीत है या असली प्रोडक्शन शुरू हो जाएगा? इस सवाल का जवाब मिलना अभी बाकी है. अगर डील फाइनल हुई तो अमेरिकी ऑटो इंडस्ट्री एक बार फिर ‘वार फैक्टरी’ बन सकती है.



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