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भारत में फेल क्यों हो गई टेस्ला? 10% टारगेट भी नहीं हो पाया पूरा, क्या 6-सीटर से होगा डैमेज कंट्रोल

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By Aman Shanti .In On April 22, 2026
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भारत में फेल क्यों हो गई टेस्ला? सेल का 10% टारगेट भी नहीं हो पाया पूरा

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Why Tesla Failed In India: क्यों टेस्ला भारत में अपनी पहचान बनाने में नाकाम रही है? क्यों एलन मस्क की गाड़ियां भारतीय सड़कों पर संघर्ष कर रही हैं और टाटा-महिंद्रा जैसे देसी ब्रांड्स ने कैसे टेस्ला की राह मुश्किल कर दी है. ताजा लॉन्च हुई 62 लाख रुपये की 6 सीटर मॉडल वाई एल (Model Y L) क्या पिछले एक साल में हुए डैमेज को कंट्रोल किया जा सकेगा?

दुनिया की सबसे बड़ी इलेक्ट्रिक कार कंपनी भारत आई, धमाका करने की कोशिश की, लेकिन हकीकत की जमीन पर उसे तगड़ा झटका लगता है. जी हां, हम बात कर रहे हैं एलन मस्क की कंपनी टेस्ला की. आज 22 अप्रैल 2026 को टेस्ला ने अपनी नई Model Y L (6-सीटर, लॉन्ग व्हीलबेस) को भारत के बाजार में उतारा है, जिसकी कीमत 62 लाख रुपये तय की गई है. यह सिर्फ एक नई लॉन्चिंग नहीं है, बल्कि एक तरह का ‘डैमेज कंट्रोल’ है, क्योंकि भारत में टेस्ला का अब तक का सफर काफी संघर्ष भरा और उम्मीद से कहीं ज्यादा फीका रहा है.

टेस्ला के भारत में संघर्ष की सबसे बड़ी वजह इसकी आसमान छूती कीमतें रही हैं. भारत में बाहर से आने वाली गाड़ियों पर सरकार 70% से 110% तक का भारी-भरकम इम्पोर्ट टैरिफ लगाती है. इसका नतीजा यह हुआ कि Model Y की कीमत 60 लाख से 68 लाख रुपये के बीच पहुंच गई. इतनी महंगी होने के कारण यह आम आदमी की पहुंच से दूर होकर Mercedes EQB, BMW iX1 और Volvo EC40 जैसी लग्जरी गाड़ियों की कैटेगरी में खड़ी हो गई. भारत जैसे देश में, जहां लोग गाड़ी खरीदने से पहले उसकी कीमत और वैल्यू पर सबसे ज्यादा ध्यान देते हैं, टेस्ला कभी भी ‘मास मार्केट’ को आकर्षित नहीं कर पाई.

आंकड़ों की बात करें तो टेस्ला का प्रदर्शन काफी बुरा रहा है. साल 2025 में कंपनी ने पूरे साल के दौरान सिर्फ 227 गाड़ियां ही बेचीं, जबकि उनका लक्ष्य कम से कम 2,500 यूनिट्स का था. स्थिति इतनी खराब हो गई कि कंपनी को अपने स्टॉक को निकालने के लिए 2 लाख रुपये तक का डिस्काउंट देना पड़ा. यह दिखाता है कि सिर्फ ब्रांड नाम के भरोसे भारतीय बाजार को जीतना इतना आसान नहीं है, खासकर तब जब ग्राहक को हर कदम पर पैसे की कीमत वसूलनी हो.

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कीमत के अलावा चार्जिंग की समस्या ने भी टेस्ला की राह मुश्किल की है. भारत में फिलहाल केवल 25,000 चार्जिंग स्टेशन हैं, जो जरूरत के हिसाब से बहुत कम हैं. कई बार तो ऐसा होता है कि जो स्टेशन मैप पर दिखते हैं, वे असल में खराब मिलते हैं. टेस्ला की सबसे बड़ी ताकत उसका ‘सुपरचार्जर नेटवर्क’ माना जाता है, जिसने अमेरिका और यूरोप में धूम मचा रखी है, लेकिन भारत में यह नेटवर्क अभी नाममात्र का ही है. बिना मजबूत चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के कोई भी EV यूजर लंबी दूरी के सफर पर निकलने से कतराता है.

भारतीय बाजार में टाटा मोटर्स जैसी घरेलू कंपनियों का दबदबा भी टेस्ला के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है. टाटा की इलेक्ट्रिक व्हीकल मार्केट में करीब 60% हिस्सेदारी है, जिसके बाद महिंद्रा और JSW MG मोटर्स का नंबर आता है. ये कंपनियां भारतीय ग्राहकों की नब्ज पहचानती हैं. टाटा नेक्सन EV और महिंद्रा की नई गाड़ियां टेस्ला के मुकाबले बहुत सस्ती हैं और भारतीय परिवारों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं. ऐसे में टेस्ला के लिए इन दिग्गजों के बीच अपनी जगह बनाना लोहे के चने चबाने जैसा रहा है.

एक और कड़वा सच यह है कि भारत में लग्जरी इलेक्ट्रिक गाड़ियों का बाजार बहुत ही छोटा है. 16.5 लाख रुपये यानी करीब 20,000 डॉलर से ऊपर की गाड़ियों की कुल बिक्री में हिस्सेदारी सिर्फ 6.6% है. इस छोटे से हिस्से में भी मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू, किआ और ऑडी जैसे पुराने और जमे-जमाए खिलाड़ी पहले से मौजूद हैं. टेस्ला को न सिर्फ इन ब्रांड्स से लड़ना पड़ रहा है, बल्कि भारतीय सड़कों की चुनौतियों से भी जूझना पड़ रहा है. टेस्ला की गाड़ियों का ग्राउंड क्लीयरेंस कम है, जो भारत के बड़े स्पीड ब्रेकर्स और गड्ढों के लिए सही नहीं बैठता. इसे ठीक करने के लिए गाड़ी के डिजाइन में बड़े बदलाव की जरूरत है, जिसमें काफी खर्च आता है.

सर्विस नेटवर्क के मामले में भी टेस्ला काफी पीछे छूट गई है. टेस्ला के शोरूम और सर्विस सेंटर सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित हैं, जबकि टाटा और महिंद्रा का नेटवर्क गांव-कस्बों तक फैला है. अगर किसी छोटे शहर के ग्राहक को गाड़ी में कोई दिक्कत आए, तो उसके पास कोई आसान रास्ता नहीं होता. इसके अलावा एलन मस्क की अपनी वैश्विक छवि और उनकी राजनीतिक गतिविधियों का असर भी कहीं न कहीं कंपनी की सेल्स पर पड़ा है, जिसे पूरी दुनिया में महसूस किया गया है.

अब सवाल यह है कि आगे क्या होगा? नई 6-सीटर Model Y L के जरिए टेस्ला भारत के उस प्रीमियम सेगमेंट को लुभाना चाहती है जो बड़ी और आरामदायक SUVs पसंद करता है. यह एक अच्छी कोशिश तो है, लेकिन जानकारों का मानना है कि जब तक टेस्ला भारत में अपनी फैक्ट्री नहीं लगाती और यहीं पर गाड़ियां बनाना शुरू नहीं करती, तब तक ऊंची कीमतों का यह सिलसिला नहीं थमेगा. लोकल मैन्युफैक्चरिंग ही वो एकमात्र रास्ता है जिससे टेस्ला भारतीय बाजार में लंबी रेस का घोड़ा बन सकती है.

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Satish Kumar एक डिजिटल कंटेंट क्रिएटर और न्यूज़ पब्लिशर हैं। ये Sarkari Yojana, Technology News और Automobile Updates पर लेख लिखते हैं। इनके लेखों का उद्देश्य लोगों को सही और तेज जानकारी देना है।