
दरअसल, USB तकनीक के विकास के साथ इसकी पहचान करने के तरीके भी बदलते गए. शुरुआती दौर में अलग-अलग USB वर्जन की स्पीड और क्षमताओं को पहचानना आसान बनाने के लिए निर्माताओं ने रंगों का सहारा लिया. हालांकि USB मानकों को नियंत्रित करने वाली संस्था USB-IF ने कभी रंगों को अनिवार्य नियम नहीं बनाया लेकिन समय के साथ कुछ रंग विशेष प्रकार के USB पोर्ट से जुड़ गए और यही एक अनौपचारिक पहचान बन गई.

USB तकनीक की शुरुआत 1996 में हुई थी. इसका मकसद विभिन्न कंपनियों के डिवाइसों और कंप्यूटरों के बीच कनेक्टिविटी को आसान बनाना था. जैसे-जैसे नए USB वर्जन आए, उनकी डेटा ट्रांसफर स्पीड बढ़ती गई. समस्या यह थी कि देखने में लगभग सभी USB-A पोर्ट एक जैसे लगते थे. इसी कारण निर्माताओं ने अलग-अलग रंगों का इस्तेमाल शुरू किया ताकि यूजर आसानी से समझ सकें कि कौन-सा पोर्ट किस क्षमता का है. सफेद रंग के USB पोर्ट सबसे पुराने USB 1.x स्टैंडर्ड से जुड़े माने जाते हैं. इनकी स्पीड बेहद सीमित थी और आज के समय में यह तकनीक लगभग पूरी तरह पुरानी हो चुकी है. यदि किसी पुराने सिस्टम में सफेद USB पोर्ट दिखाई दे तो वह शुरुआती USB पीढ़ी का संकेत हो सकता है.
Published at : 10 Jun 2026 07:11 PM (IST)