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राजस्थान के दौसा में दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर हुए भीषण बस हादसे ने एक बार फिर बसों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. आखिर क्यों बार-बार बसों में आग लग जाती है? किन तकनीकी खामियों और लापरवाहियों से ऐसी घटनाएं होती हैं? जानिए इस रिपोर्ट में बस आग की बड़ी वजहें और वे जरूरी सुरक्षा उपाय, जो समय रहते लागू हों तो कई जिंदगियां बच सकती हैं.
आइए जानते हैं कि बस में आग लगने की समस्या को कैसे रोका जा सकता है.
राजस्थान के दौसा जिले में दिल्ली-मुम्बई एक्सप्रेसवे पर बुधवार तड़के एक स्लीपर बस ट्रक से टकराकर भयानक आग की चपेट में आ गई. हरिद्वार से इंदौर जा रही बस में करीब 37 यात्री सवार थे. हादसे में 8 लोगों की मौत हो गई जबकि 22 घायल हुए. घटना 2:30 से 3:00 बजे के बीच हुई. बस के टकराते ही आग भड़क उठी और पूरी बस जलकर राख हो गई. घायलों को पास के अस्पतालों में भर्ती कराया गया.
ये हादसा अकेला नहीं है. हाल के महीनों में भारत में बस आग की कई भयानक घटनाएं हो चुकी हैं. अक्टूबर 2025 में राजस्थान के जैसलमेर में इलेक्ट्रिकल फेलियर से बस में आग लगी, जिसमें 22 लोग जलकर मर गए. उसी महीने आंध्र प्रदेश के कुरनूल में मोटरसाइकिल से टक्कर के बाद बस आग की लपटों में झुलस गई, 19-25 लोगों की मौत हुई.
मार्च 2026 में आंध्र प्रदेश के मार्कापुरम में बस-टिपर की टक्कर के बाद आग में 13-14 लोग मारे गए. इन घटनाओं में कुल सैकड़ों मौतें और सैकड़ों घायल हुए हैं. ज्यादातर मामलों में इलेक्ट्रिकल शॉर्ट सर्किट, इंजन ओवरहीटिंग, जाम दरवाजे और ज्वलनशील इंटीरियर मैटेरियल सबसे बड़े कारण होते हैं. आइए जानते हैं कि ऐसी समस्याओं को कैसे रोका जा सकता है?
ऐसे रोका जा सकता था हादसा!
ऐसी स्थिति को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने की बड़ी जरूरत है. सबसे पहले, सभी बसों (खासकर प्राइवेट इंटरसिटी स्लीपर बसों) में ऑटोमैटिक फायर डिटेक्शन और सप्रेशन सिस्टम अनिवार्य किए जाने चाहिए. इंजन बे, बैटरी और इलेक्ट्रिकल सर्किट में आग लगने पर तुरंत बुझाने वाली तकनीक बचाव का समय बढ़ा सकती है. बसों के इंटीरियर में फ्लेम-रिटार्डेंट मैटेरियल का इस्तेमाल अनिवार्य होना चाहिए, ताकि आग तेजी से न फैले.
साफ मार्किंग की जरूरत
इमरजेंसी एग्जिट डोर और विंडो हमर को साफ-साफ मार्क करना चाहिए और हर यात्री को बोर्डिंग के समय सेफ्टी ब्रीफिंग दी जानी चाहिए. जाम होने वाले दरवाजों की समस्या से निपटने के लिए बेहतर डिजाइन और नियमित मेंटेनेंस जरूरी हैं. ड्राइवरों को फायर फाइटिंग ट्रेनिंग और स्पीड लिमिट का सख्ती से पालन कराया जाना चाहिए. एक्सप्रेसवे पर रात के समय लंबी दूरी की बसों के लिए ज्यादा सख्त मॉनिटरिंग होना अब जरूरी हो गया है.
अगर ये उपाय समय रहते अपनाए जाते, तो कई जिंदगियां बचाई जा सकती थीं. दौसा हादसे में अगर बस में फायर सप्रेशन सिस्टम होता तो आग को शुरुआती दौर में काबू किया जा सकता था. इमरजेंसी हमर से यात्री जल्दी निकल पाते. सरकार, परिवहन विभाग और बस ऑपरेटर्स को मिलकर सड़क सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी. केवल जांच और मुआवजे से काम नहीं चलेगा. व्यवस्थागत बदलाव जरूरी हैं.
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न्यूज़18 हिंदी में सीनियर सब-एडिटर के रूप में कार्यरत राम मोहन मिश्र 2021 से डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं और फिलहाल ऑटो डेस्क संभाल रहे हैं. वे कार और बाइक से जुड़ी जानकारी को आसान, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से …और पढ़ें