Budget 2026 Key Terms Explained: 1 फरवरी 2026 को पेश होने वाला यूनियन बजट न सिर्फ देश की आर्थिक दिशा तय करेगा, बल्कि यह आम लोगों की उम्मीदों से भी जुड़ा हुआ है. जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में बजट पेश करेंगी, तब देश ही नहीं, दुनिया भर की नजरें भारत की नीतियों पर होंगी. बजट में कही गई हर बात का प्रभाव देश पर पड़ता है.
हर वर्ग केंद्र सरकार से अलग-अलग उम्मीदें लगाए बैठे हैं. लेकिन कई बार इसकी कठिन भाषा लोगों को उलझा देती है और वे बजट को अच्छे से समझ नहीं पाते हैं. इस कारण बजट को सही मायनों में समझने के लिए उससे जुड़े शब्दों और अर्थों को जानना बेहद जरूरी हो जाता है. आइए जानते हैं, बजट से संबंधित कुछ शब्दों के बारे में…
फिस्कल डेफिसिट का मतलब क्या है?
किसी भी सरकार की आमदनी और खर्च के बीच जब बड़ा अंतर पैदा हो जाता है, तब उसे पूरा करने के लिए सरकार को बाजार से कर्ज लेना पड़ता है. इसी उधार को फिस्कल डेफिसिट या राजकोषीय घाटा कहा जाता है. अगर यह घाटा ज्यादा बढ़ जाए, तो अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ता है.
जिससे अर्थव्यवस्था कमजोर होती है. वहीं, जब यह सीमित दायरे में रहता है, तो देश की वित्तीय स्थिति को संतुलित माना जाता है.
कैपिटल और रेवेन्यू एक्सपेंडिचर में फर्क
सरकार जो पैसा सड़क, पुल, स्कूल और अस्पताल जैसी स्थायी सुविधाओं को बनाने में खर्च करती है, उसे कैपिटल एक्सपेंडिचर कहा जाता है. इसे अच्छा निवेश माना जाता है, क्योंकि इससे भविष्य में देश की ताकत मजबूत होती है.
वहीं, कर्मचारियों की सैलरी, पेंशन और रोजमर्रा के खर्च रेवेन्यू एक्सपेंडिचर के अंतर्गत आते हैं. इन खर्चों से कोई नई संपत्ति नहीं बनती. हालांकि, सरकारी व्यवस्था को चलाने में मदद मिलती है.
फिस्कल और मॉनेटरी पॉलिसी की भूमिका
बजट के दौरान फिस्कल और मॉनेटरी पॉलिसी जैसे शब्द समझने में लोगों को दिक्कत होती हैं. जब बजट के जरिए सरकार टैक्स और सरकारी खर्च को संतुलित करती है तो इसे फिस्कल पॉलिसी कहा जाता है.
वहीं, ब्याज दर तय करना और जरूरत के मुताबिक नोट छापना रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी के तहत होता है. इन दोनों नीतियों के तालमेल से ही अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने की कोशिश की जाती है.
विनिवेश से जुटाती है सरकार पैसा
जब सरकार को अतिरिक्त पैसों की जरूरत पड़ती है, तो वह अपनी सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचती है. जिसे विनिवेश या डिसइन्वेस्टमेंट कहा जाता है. इसे आम भाषा में ऐसे समझा जा सकता है, जैसे कोई परिवार जरूरत पड़ने पर अपना कीमती चीज बेचकर खर्च पूरा करता है. इससे सरकार को तुरंत धन मिलता है, जिससे वह अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने का काम करती है.
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