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E20 पेट्रोल को लेकर सोशल मीडिया पर पानी, इंजन डैमेज, माइलेज, वारंटी और किसानों से जुड़े कई दावे वायरल होते रहे हैं. लेकिन सरकारी दस्तावेजों, ARAI, SIAM और ऑयल कंपनियों के स्पष्टीकरण इन दावों की अलग तस्वीर पेश करते हैं. आखिर कौन-सी बातें सच हैं और कौन-सी सिर्फ अफवाह? इस रिपोर्ट में E20 से जुड़े 10 बड़े मिथकों का फैक्ट चेक आसान भाषा में पढ़ें और जानें कि वास्तविकता क्या है.
पानी की खपत का भ्रम (10,000 लीटर का मिथक): सोशल मीडिया पर ये दावा किया जा रहा है कि 1 लीटर इथेनॉल बनाने में 10,000 लीटर पानी खर्च होता है, जो पूरी तरह गलत है. हकीकत ये है कि इथेनॉल प्लांट में प्रति लीटर सिर्फ 3 से 5 लीटर पानी ही लगता है . किसान धान और गेहूं इथेनॉल के लिए नहीं, बल्कि सरकारी खरीद (MSP) के लिए उगाते हैं. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के बाद बचे अतिरिक्त चावल और मक्के का उपयोग ही इथेनॉल के लिए होता है. (AI Image)
बिना जांचा-परखा प्रयोग होने का दावा: ये दावा गलत है कि E20 भारत के नागरिकों पर किया जा रहा एक जोखिम भरा प्रयोग है . दुनिया भर में इथेनॉल का इस्तेमाल एक सदी से भी ज्यादा समय से हो रहा है, यहां तक कि 1908 की फोर्ड मॉडल टी भी इस पर चल सकती थी . अमेरिका में E10 स्टैंडर्ड फ्यूल है और ब्राजील में E27 अनिवार्य है . भारत का E20 प्रोग्राम पूरी तरह से वैश्विक मानकों के अनुरूप है. (AI Image)
माइलेज में भारी गिरावट की अफवाह: ये दावा भ्रामक है कि E20 से गाड़ियों के माइलेज में भारी कमी आती है . ARAI द्वारा कारों पर 40,000 किमी और दोपहिया वाहनों पर 20,000 किमी के कड़े परीक्षणों में माइलेज पर कोई खास नकारात्मक असर नहीं देखा गया . इसके विपरीत, इथेनॉल के हाई ऑक्टेन (108.5 RON) की वजह से गाड़ियों को बेहतर एक्सीलरेशन और राइड क्वालिटी मिलती है. (AI Image)
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इंजन खराब और संक्षारित (Corrode) होने का डर: सोशल मीडिया का ये दावा गलत है कि E20 इंजन के पुर्जों को नुकसान पहुंचाता है . सरकार द्वारा कराए गए ARAI के विशेष अध्ययन में पाया गया कि गाड़ियों की ड्राइवबिलिटी, स्टार्ट होने या मेटल और प्लास्टिक कंपैटिबिलिटी में कोई समस्या नहीं है . केवल कुछ पुरानी गाड़ियों में रबर पार्ट्स को थोड़ा जल्दी बदलना पड़ सकता है. साथ ही, इससे प्रदूषण में भारी कमी आती है. (AI Image)
इंश्योरेंस और वारंटी रद्द होने की अफवाह: ये दावा पूरी तरह झूठा है कि E20 फ्यूल का इस्तेमाल करने पर कार कंपनियां वारंटी या इंश्योरेंस क्लेम देने से मना कर देंगी . SIAM और वाहन निर्माताओं ने साफ किया है कि निर्धारित मानकों वाले E20 ईंधन के इस्तेमाल से वारंटी या इंश्योरेंस पर कोई असर नहीं पड़ेगा . PIB फैक्ट चेक ने भी 16 जून 2026 को इस भ्रामक खबर का खंडन किया था. (AI Image)
फ्यूल कैप पर चींटियों और मधुमक्खियों का लगना: ये दावा कि E20 में चीनी होने के कारण चींटियां और मधुमक्खियां पेट्रोल टैंक की तरफ आकर्षित होती हैं, पूरी तरह वैज्ञानिक रूप से आधारहीन है . BPCL की जांच के अनुसार, इथेनॉल बनाने की डिस्टिलेशन प्रक्रिया में बची हुई चीनी पूरी तरह खत्म हो जाती है . इथेनॉल में ऐसे तत्व (denaturants) मिले होते हैं, जो कीड़ों को दूर रखते हैं और पेट्रोल की गंध ही हावी रहती है. (AI Image)
सुप्रीम कोर्ट में सरकार द्वारा ‘प्रयोग’ कहने का झूठ: ये दावा गलत है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में E20 को अगले साल समीक्षा किया जाने वाला एक ‘प्रयोग’ बताया है. असल में वह अदालती मामला केवल इथेनॉल खरीद के अनुबंधों और आवंटन प्रक्रिया से जुड़ा था. अटॉर्नी जनरल ऑफिस ने 30 जून 2026 को स्पष्ट किया कि सरकार ने कोर्ट में E20 को कभी भी ‘प्रयोग’ नहीं कहा है. (AI Image)
फ्यूल टैंक में पानी आने की समस्या: ये दावा गलत है कि E20 ईंधन के कारण गाड़ियों के टैंक में पानी जमा होने लगता है . पेट्रोलियम मंत्रालय (MoP&NG) के अनुसार, किसी भी ईंधन में पानी का जाना गलत है. आधुनिक गाड़ियों और पेट्रोल पंपों के अंडरग्राउंड टैंकों में पानी के प्रवेश को रोकने के लिए सिलिका जेल ट्रैप, विशेष गास्केट और सीलेंट जैसे पुख्ता सुरक्षा इंतजाम होते हैं . (AI Image)
पेट्रोल में गन्ने का जूस मिलाने वाले फर्जी वीडियो: सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वे वीडियो पूरी तरह फर्जी और भ्रामक हैं, जिनमें पेट्रोल में सीधे गन्ने का रस मिलाते हुए और पेट्रोल को अलग होते हुए दिखाया गया है. पेट्रोलियम मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि ईंधन में मिलने वाला इथेनॉल कड़े औद्योगिक मानकों के तहत तैयार होता है. सामान्य तापमान पर इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कभी अलग नहीं होता. (AI Image)
इथेनॉल प्लांट से पर्यावरण और किसानों को नुकसान का भ्रम: ये दावा गलत है कि इथेनॉल प्लांट पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं. मॉडर्न प्लांट जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) तकनीक पर चलते हैं और इन्हें कड़ी पर्यावरणीय मंजूरियां लेनी होती हैं. इस प्रोग्राम से देश को 1.90 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की विदेशी मुद्रा बची है और किसानों को 1.60 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान हुआ है. (AI Image)