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अब 13 साल से कम उम्र के बच्चे भी चला पाएंगे WhatsApp, क्या होगा इसका असर? एक्सपर्ट्स से जानिए जवाब

Aman Shanti .In
By Aman Shanti .In On March 16, 2026
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Social Media Impact on Childern: WhatsApp पर अब 13 साल से कम उम्र के बच्चे भी अकाउंट बना सकेंगे. इसके लिए कंपनी ने हाल ही में पैरेंट-मैनेज्ड अकाउंट फीचर की शुरुआत की है. इसमें पैरेंट बच्चों के अकाउंट को अपने डिवाइस से लिंक कर सकेंगे. इसका फायदा यह होगा कि बच्चों की बातचीत पर उनके पैरेंट्स की नजर रहेगी. एक तरफ जहां कई देशों में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ WhatsApp छोटे बच्चों के लिए यह फीचर लेकर आई है. ऐसे फीचर के यूज करने के फायदे-नुकसान क्या हैं और इससे बच्चों के दिमाग पर क्या असर पड़ेगा? यह जानने के लिए एबीपी न्यूज ने साइकोलॉजिस्ट और आईटी एक्सपर्ट्स से बातचीत की है. आइए जानते हैं कि उनका इस बारे में क्या कहना है.

पैरेंटल कंट्रोल के बावजूद कई खतरे

मैक्योर हॉस्पिटल के आईटी मैनेजर प्रबीर जना का कहना है कि पैरेंटल कंट्रोल से एक्सपोजर कम हो जाता है, लेकिन लगातार एडवांस होती टेक्नोलॉजी, एनक्रिप्टेड और डिसअपीयरिंग कंटेट आदि के कारण खतरा पूरी तरह टलता नहीं है. बच्चों से बात कर उन्हें इन खतरों के बारे में बताया जा सकता है.

एनक्रिप्शन के कारण डिटेक्शन हुआ मुश्किल

व्हाट्सऐप समेत कई दूसरे प्लेटफॉर्म्स पर आजकल चैट्स एंड-टूं-एंड एनक्रिप्टेड होती है. ऐसे में चैट्स के कंटेट को डिटेक्ट करना मुश्किल हो जाता है. इससे यह पता नहीं चल पाता कि बच्चे किससे बात कर रहे हैं. इसके अलावा बच्चों के स्कैम में फंसने का भी ज्यादा खतरा है. बच्चे लोगों पर भरोसा आसानी से कर लेते हैं और उन्हें यह पता नहीं होता कि असली ऐप्स कभी भी कोड शेयर करने को नहीं कहती हैं. ऐसे स्कैम व्हाट्सऐप, स्नैपचैट और डिस्कॉर्ड आदि पर तेजी से फैलते हैं. इसलिए उन्हें यह बता दें कि किसी के साथ कोई भी कोड शेयर न करें.

इन तरीकों से बच्चों को टारगेट करते हैं स्कैमर्स

प्रबीर जना ने बताया कि स्कैमर और फ्रॉडस्टर फेक प्रोफाइल के जरिए बच्चों को टारगेट करते हैं. वो शुरुआत में पब्लिक ग्रुप्स या चैट में किसी की तारीफ करेंगे और फिर सीधे डायरेक्ट मैसेज करने लगते हैं. वो भरोसा जीतकर फ्रेंडशिप करना चाहते हैं और फिर फोटो और वीडियो की डिमांड करते हैं. इसी तरह स्कैमर OTP बताने के बदले रिवॉर्ड का लालच देते हैं और उनके किसी फ्रेंड या इंफ्लुएंसर की नकल कर पर्सनल इंफोर्मेशन निकलवाना चाहते हैं.

बचाव के क्या तरीके?

  • हमेशा ऐप्पल फैमिली शेयरिंग या गूगल फैमिली लिंक को यूज करें. इसमें ऐप्स अप्रूवल, स्क्रीन टाइम लिमिट सेट करने और कंटेट को फिल्टर करने समेत कई ऑप्शन मिल जाते हैं.
  • व्हाट्सऐप पर बच्चों के लिए पैरेंट-मैनेज्ड अकाउंट क्रिएट करें. इससे बच्चे के पास आने वाले मैसेज और कॉल्स पर कंट्रोल रहेगा.
  • स्नैपचैट और इंस्टाग्राम समेत हर ऐप पर टीन-पैरेंट मोड इनेबल और लोकेशन शेयरिंग और डिसअपीयरिंग मैसेज आदि फीचर डिसेबल कर दें.
  • हमेशा डिवाइस पर मजबूत पासवर्ड यूज करें और स्क्रीन-टाइम को इनेबल रखें.

बच्चों के दिमाग पर सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स का क्या असर?

आजकल बच्चे कम उम्र से ही स्मार्टफोन और मैसेजिंग ऐप्स यूज करना शुरू कर देते हैं. इससे उनके सोशल मीडिया इमोशनल डेवलपमेंट पर असर पड़ता है. इस बारे में बताते हुए PSRI हॉस्पिटल में साइकोलॉजिस्ट और काउंसलर अर्पिता कोहली का कहना है कि व्हाट्सऐप जैसे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म बच्चे की सोशल और इमोशनल ग्रोथ पर असर डालते हैं. इन्हें यूज करने से बच्चे का फेस-टू-फेस इंटरेक्शन कम हो जाता है. इस कारण उनकी इमोशन समझने, कम्यूनिकेशन स्किल डेवलप करने और सोशल रिलेशनशिप बनाने की एबिलिटी डेवलप नहीं हो पाती. इसलिए इन प्लेटफॉर्म को यूज करते समय पैरेंटल गाइडेंस होना बहुत जरूरी है.

व्हाट्ऐप के पैरेंट-मैनेज्ड अकाउंट को लेकर कोहली का कहना है कि इससे बच्चों को ऑनलाइन दुनिया में सेफ और रिस्पॉन्सिबल रहना सीखने में मदद मिल सकती है. इस अकाउंट के कारण बच्चे अनजान लोगों से इंटरैक्ट नहीं करेंगे, लेकिन अगर स्क्रीन टाइम लिमिटेड नहीं किया गया तो बच्चे पूरी तरह डिजिटल कम्यूनिकेशन पर डिपेंड हो सकते हैं.

पैरेंट्स के लिए क्या सलाह?

पैरेंट्स को सलाह देते हुए कोहली ने कहा कि माता-पिता को बच्चों पर सख्ती से नजर रखने की बजाय खुलकर बातचीत करनी चाहिए. उन्हें ऑनलाइन सेफ्टी के बारे में बताते हुए स्क्रीन टाइम के लिए साफ नियम रखने चाहिए. साथ ही बच्चों को यह बताना चाहिए कि वो किस पर भरोसा कर सकते हैं. बच्चों को यह बताना भी जरूरी है कि उनकी मॉनिटरिंग क्यों की जा रही है.

क्या पैरेंटल कंट्रोल से डिजिटल दुनिया के खतरे कम होते हैं?

इसके जवाब में एक्सपर्ट का कहना है कि इससे साइबर बुलिंग के खतरे कम हो जाते हैं. व्हाट्सऐप जैसी ऐप्स पर पैरेंटल कंट्रोल से डिजिटल एनवायरनमेंट सेफ होता है. इसके साथ ही बच्चों को ऑनलाइन सेफ्टी के बारे में बताना भी जरूरी है. अगर कोई बच्चा अपने फोन को छिपाकर रखने लगता है या उसके बर्ताव में बदलाव आता है तो पैरेंट्स को इन्हें वार्निंग साइन समझना चाहिए. इसका मतलब है कि बच्चे को कोई तंग कर रहा है. अगर सोशल मीडिया ऐप्स यूज करने के बाद बच्चे की नींद, मूड और बिहेवियवर में कोई चेंज दिखता है तो पैरेंट्स को उसके साथ बातचीत करनी चाहिए और उसकी चिंताओं को समझना चाहिए.

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Սաթիշ Կումարը թվային բովանդակության ստեղծող և նորությունների հրատարակիչ է։ Նա գրում է հոդվածներ պետական ​​ծրագրերի, տեխնոլոգիական նորությունների և ավտոմոբիլային թարմացումների վերաբերյալ։ Նրա հոդվածների նպատակն է մարդկանց ճիշտ և արագ տեղեկատվություն տրամադրելը։