Shwaasa AI App: फोन के सामने खांसेंगे, ऐप बता देगा फेफड़ों का हाल! AIIMS ने इस AI ऐप को दी मंजूरी, जानें कैसे काम करता है काम

सतीश कुमार
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How Shwaasa AI App Detects COPD Through Cough: कर्नाटक के एक स्टार्टअप ने एआई आधारित मोबाइल एप ‘श्वासा’ तैयार किया है, जिसे एम्स से मान्यता मिल चुकी है. माना जा रहा है कि यह एप देश की प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था में जांच से जुड़ी एक बड़ी कमी को दूर करने में मददगार साबित हो सकता है. यह एप खास एल्गोरिद्म तकनीक के जरिए मरीजों में क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज की स्क्रीनिंग करता है, जो भारत में बीमारियों का एक प्रमुख कारण है.

एम्स दिल्ली में हुआ टेस्ट

एम्स-दिल्ली ने पिछले साल अपने बल्लभगढ़ केंद्र में 460 लोगों पर इसका टेस्ट किया. लंग्स की जांच के लिए इस्तेमाल होने वाली स्पाइरोमेट्री, जिसे इस एरिया का मानक परीक्षण माना जाता है, उससे तुलना करने पर एप के नतीजों में संतोषजनक समानता पाई गई. खासकर गंभीर मामलों में इसकी सटीकता ज्यादा मजबूत रही. सामान्य और असामान्य मामलों में अंतर पहचानने में यह करीब 90 प्रतिशत तक सही पाया गया, जबकि सीओपीडी और अस्थमा जैसी बीमारियों की पहचान में इसकी सटीकता 82 से 87 प्रतिशत के बीच रही. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

सीओपीडी भारत में बीमारी का दूसरा बड़ा कारण है, लेकिन अधिकतर जिला अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्पाइरोमेट्री की सुविधा उपलब्ध नहीं है. एम्स से जुड़े डॉक्टर हर्षल रमेश साल्वे, जो इस टेस्ट का हिस्सा थे, उन्होंने कहा कि “कई जिला अस्पतालों में भी स्पाइरोमेट्री की सुविधा नहीं है. यह ज्यादातर मेडिकल कॉलेजों तक सीमित है.”

काफी आसानी से कर सकते हैं यूज

एप का काम करने का तरीका काफी सरल है. मरीज को सिर्फ स्मार्टफोन में खांसना होता है. फोन का माइक्रोफोन खांसी की आवाज रिकॉर्ड करता है और उसमें लगा एआई सॉफ्टवेयर तुरंत उसका एनालिसिस करता है. कुछ ही मिनटों में यह बता देता है कि लंग्स सामान्य हैं या सीओपीडी अथवा अस्थमा के संकेत दिख रहे हैं. पूरी जांच करीब आठ मिनट में पूरी हो जाती है. स्पाइरोमेट्री के उलट, इस एप को चलाने के लिए किसी खास टेस्ट या भारी उपकरण की जरूरत नहीं पड़ती. यही वजह है कि इसे संसाधन सीमित इलाकों के लिए उपयोगी माना जा रहा है. एम्स के डॉक्टरों ने सुझाव दिया है कि जहां स्पाइरोमेट्री उपलब्ध नहीं है, वहां प्राथमिक और माध्यमिक स्वास्थ्य केंद्रों, यहां तक कि आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.

टीवी को लेकर भी हो रहा है टेस्ट
एम्स एक अलग रिसर्च परियोजना के तहत टीवी की स्क्रीनिंग में भी इसकी उपयोगिता का आकलन कर रहा है. फिलहाल यह उपकरण कर्नाटक समेत कुछ राज्यों में इस्तेमाल हो रहा है. फरीदाबाद में निजी डॉक्टरों को जोड़कर इसके उपयोग को और बढ़ाने की योजना है, ताकि इसके नतीजों को दर्ज किया जा सके.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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Satish Kumar Is A Journalist With Over 10 Years Of Experience In Digital Media. He Is Currently Working As Editor At Aman Shanti, Where He Covers A Wide Variety Of Technology News From Smartphone Launches To Telecom Updates. His Expertise Also Includes In-depth Gadget Reviews, Where He Blends Analysis With Hands-on Insights.