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क्या आपने कभी सोचा है कि ट्रैफिक सिग्नल में लाल, पीला और हरा रंग ही क्यों होते हैं? दिलचस्प बात ये है कि इसकी शुरुआत सड़कों से नहीं, बल्कि रेल पटरियों से हुई थी. कभी सफेद रंग भी ‘गो’ सिग्नल हुआ करता था, लेकिन एक बड़ी गलती ने इसे हमेशा के लिए हटा दिया. जानिए ट्रैफिक लाइट के इन रंगों के पीछे छिपा विज्ञान और चौंकाने वाला इतिहास…
रेलगाड़ियों से हुई थी शुरुआत: ट्रैफिक लाइट का इतिहास सड़कों से नहीं, बल्कि रेल की पटरियों से शुरू हुआ था. 1868 में लंदन में पहली बार गैस से चलने वाली ट्रैफिक लाइट लगाई गई थी. उस समय सड़कों पर गाड़ियों की संख्या कम थी, लेकिन ट्रेनों को नियंत्रित करना बड़ी चुनौती थी. शुरुआती दौर में लाल रंग रुकने के लिए और सफेद रंग जाने के लिए इस्तेमाल होता था, लेकिन सफेद रंग ने जल्द ही एक बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी.
सफेद रंग को क्यों हटाया गया?: शुरुआत में हरा रंग ‘सावधानी’ के लिए और सफेद रंग ‘आगे बढ़ने’ के लिए था. लेकिन ड्राइवरों को अक्सर भ्रम हो जाता था. कई बार सिग्नल का लाल रंग का लेंस टूट जाता था, जिससे पीछे से आ रही सफेद रोशनी दिखने लगती थी. ड्राइवर को लगता था कि रास्ता साफ है और ट्रेनें आपस में टकरा जाती थीं. इस बड़े खतरे को देखते हुए सफेद रंग को सिग्नल से पूरी तरह हटा दिया गया.
लाल रंग ही ‘खतरा’ क्यों है?: लाल रंग को रुकने के संकेत के तौर पर चुनने के पीछे भौतिक विज्ञान (Physics) का एक बड़ा कारण है. लाल रंग की तरंग दैर्ध्य (Wavelength) सबसे अधिक होती है. इसका मतलब है कि ये रंग हवा के कणों से सबसे कम फैलता है. कोहरा हो, बारिश हो या धूल, लाल रंग बहुत दूर से ही स्पष्ट दिखाई देता है. यही कारण है कि इसे खतरे और रुकने के संकेत के लिए चुना गया.
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हरा रंग: सफेद रंग के फेल होने के बाद हरे रंग को ‘गो’ (Go) सिग्नल के लिए चुना गया. हरा रंग आंखों के लिए सबसे सुकूनदायक माना जाता है. मनोवैज्ञानिक रूप से ये सुरक्षा और शांति का प्रतीक है. जब आप सड़क पर हरा रंग देखते हैं, तो मस्तिष्क को ये संकेत मिलता है कि अब आगे बढ़ना सुरक्षित है. लाल रंग के साथ इसका कॉन्ट्रास्ट (विपरीत प्रभाव) भी बहुत अच्छा बैठता है.
पीले रंग का क्या है महत्व?: पीला रंग सबसे बाद में जोड़ा गया. पहले सिर्फ लाल और हरा रंग ही होता था, जिससे वाहन चालक अचानक ब्रेक लगाने पर मजबूर हो जाते थे. पीला रंग ‘सावधानी’ का संकेत देता है. इसकी तरंग दैर्ध्य लाल के बाद सबसे अच्छी होती है, जिससे ये दूर से नजर आता है. ये ड्राइवरों को मानसिक रूप से तैयार करता है कि या तो वे रुकने वाले हैं या फिर उन्हें अब चलने के लिए तैयार होना है.
मॉडर्न ट्रैफिक लाइट का आविष्कार: बिजली से चलने वाली पहली आधुनिक ट्रैफिक लाइट 1912 में अमेरिका में विकसित की गई थी. लेस्टर वायर नाम के एक पुलिसकर्मी ने इसे बनाया था. इसमें केवल लाल और हरे रंग का उपयोग होता था और साथ में एक बजर बजता था ताकि लोग अलर्ट हो सकें. 1920 में विलियम पॉट्स ने इसमें पीला रंग जोड़कर इसे वह स्वरूप दिया जो आज हम दुनिया भर की सड़कों पर देखते हैं.
रंग अंधापन (Color Blindness) का ध्यान: ट्रैफिक सिग्नल डिजाइन करते समय ‘कलर ब्लाइंड’ लोगों का भी विशेष ध्यान रखा गया है. कई लोगों को लाल और हरे रंग में अंतर करने में दिक्कत होती है. इसलिए मॉडर्न सिग्नल्स में लाल रंग में थोड़ा नारंगी और हरे रंग में थोड़ा नीला रंग मिलाया जाता है. इसके अलावा, दुनिया भर में एक ही स्टैंडर्ड रखा गया है कि लाल हमेशा ऊपर, पीला बीच में और हरा सबसे नीचे होगा.
सुरक्षित सफर का विज्ञान: आज ये तीन रंग दुनियाभर के ट्रैफिक सिस्टम को सुचारू रूप से चला रहे हैं. बिना किसी भाषा के, ये रंग हर देश और हर संस्कृति के लोगों को एक ही संदेश देते हैं. विज्ञान और इतिहास के इस संगम ने सड़कों को सुरक्षित बनाया. अगली बार जब आप सिग्नल पर रुकें, तो याद रखिएगा कि ये तीनों कलर आपकी सुरक्षा के लिए सदियों के प्रयोगों के बाद चुने गए हैं.