Tulsidas ka jivan parichay – जीवनी, रचनाएँ & महत्व

सतीश कुमार
30 Min Read

एक कालजयी साधक का परिचय

हिंदी साहित्य के आकाश में जिन महान सूर्यों ने ज्ञान और भक्ति की अमर ज्योति जलाई, उनमें गोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulsidas) का नाम सर्वोपरि है। “तुलसीदास का जीवन परिचय” (Tulsidas Ka Jivan Parichay) सिर्फ एक ऐतिहासिक व्यक्ति की जीवनी नहीं, बल्कि भक्ति, वैराग्य, साहित्यिक प्रतिभा और लोककल्याण की उस साधना का दस्तावेज है, जिसने करोड़ों हिंदू हृदयों में श्रीराम के प्रति अगाध श्रद्धा का सिंचन किया।

तुलसीदास जी ने अपनी अमर कृति ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से भगवान राम की कथा को राजभवनों से निकालकर आम जनता तक पहुँचाया। उन्होंने अवधी और ब्रज भाषा को ऐसी मधुरता और ओजस्विता प्रदान की कि उनके दोहे और चौपाइयाँ आज भी घर-घर में गूँजते हैं। यह लेख तुलसीदास जी के जीवन के हर पहलू – उनके जन्म, बाल्यकाल, शिक्षा, विवाह, वैराग्य, साहित्यिक रचनाओं और उनके दार्शनिक सिद्धांतों पर एक व्यापक और गहन दृष्टि प्रदान करेगा।


अध्याय 1: तुलसीदास का प्रारंभिक जीवन और जन्म

तुलसीदास जी का जीवन इतिहास और लोककथाओं के अद्भुत मेल से बना है। ऐतिहासिक साक्ष्यों और प्रचलित मान्यताओं के आधार पर उनके जन्म को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं।

1.1 जन्मस्थान और काल:
अधिकांश विद्वानों का मानना है कि तुलसीदास जी का जन्म सन 1532 ईस्वी में हुआ था। उनके जन्म स्थान के regarding दो प्रमुख मत प्रचलित हैं:

  • राजापुर, बांदा जिला, उत्तर प्रदेश: यह स्थान अधिकांश विद्वानों द्वारा स्वीकार किया जाता है। यह यमुना नदी के तट पर स्थित है।

  • सोरों, कासगंज जिला, उत्तर प्रदेश: कुछ लोगों का मानना है कि उनका जन्म सोरों नामक स्थान पर हुआ था।

उनके जन्म की तिथि को लेकर भी निश्चितता नहीं है, लेकिन भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी (जिसे ‘तुलसी जयंती’ के रूप में मनाया जाता है) को उनका जन्मदिन माना जाता है।

1.2 जन्म की लोककथा और ऐतिहासिकता:
तुलसीदास के जन्म को लेकर एक रोचक लोककथा प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि वे 12 महीने तक माँ के गर्भ में रहे और जन्म के समय उनके पूरे मुख में बत्तीसों दांत थे। इस असाधारण स्वरूप के कारण उनके माता-पिता हैरान हुए और उनकी मृत्यु भी शीघ्र ही हो गई। इस कारण बालक तुलसीदास को बहुत ही कष्टमय बचपन बिताना पड़ा। एक दासी ने उनका पालन-पोषण किया, लेकिन पांच साल की उम्र में वह दासी भी चल बसी। इसके बाद वे भिक्षा माँगकर अपना जीवन यापन करने लगे।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो यह कथा उनके जीवन की प्रारंभिक कठिनाइयों और एक सामान्य मनुष्य से महान संत बनने के उनके अद्भुत परिवर्तन को दर्शाती है।

1.3 माता-पिता और गोत्र:
तुलसीदास जी के पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था। वे सारस्वत ब्राह्मण थे और उनका गोत्र पराशर माना जाता है। उनके बचपन का नाम रामबोला था।


अध्याय 2: शिक्षा-दीक्षा और गुरु का महत्व

तुलसीदास जी के जीवन में ज्ञानार्जन और गुरु की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।

2.1 गुरु नरहरिदास से मुलाकात:
कहा जाता है कि एक दिन जब बालक रामबोला भिक्षा माँग रहे थे, तो संत श्री नरहरिदास जी की दृष्टि उन पर पड़ी। संत ने उनमें असाधारण प्रतिभा और भक्ति की संभावना देखी और उन्हें अपना शिष्य बना लिया। उन्होंने ही रामबोला का नाम ‘तुलसीदास’ रखा।

2.2 शिक्षा और ज्ञानार्जन:
गुरु नरहरिदास ने तुलसीदास को वाराणसी (काशी) ले जाकर उन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन, इतिहास और विभिन्न शास्त्रों की शिक्षा दी। तुलसीदास बहुत ही मेधावी और तेजस्वी छात्र थे। उन्होंने अल्प समय में ही समस्त विद्याओं में mastery हासिल कर ली। काशी में रहकर उन्होंने शेषसनातन जी से भी ज्ञान प्राप्त किया।

2.3 गुरु का प्रभाव:
तुलसीदास के जीवन पर उनके गुरु नरहरिदास का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने ही तुलसीदास को भगवान राम की कथा सुनाई और उनके हृदय में राम-भक्ति की अलख जगाई। तुलसीदास ने स्वयं लिखा है – “गुरु बिनु भवनिधि तरइ न कोई।” यह उनके जीवन में गुरु के महत्व को स्पष्ट करता है।


अध्याय 3: गृहस्थ जीवन और वैराग्य

तुलसीदास का गृहस्थ जीवन एक ऐसा मोड़ था, जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।

3.1 विवाह और पत्नी रत्नावली:
शिक्षा पूरी करने के बाद तुलसीदास जी का विवाह रत्नावली (जिनका एक नाम दीनबंधु पाठक की पुत्री भी बताया जाता है) नामक एक सुशील और सुंदर कन्या से हुआ। कहा जाता है कि तुलसीदास जी अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे और कुछ समय तक उनका गृहस्थ जीवन सुखपूर्वक व्यतीत हुआ।

3.2 वैराग्य की प्रेरणा:
तुलसीदास के वैराग्य की कहानी बहुत प्रसिद्ध है। एक बार जब रत्नावली अपने मायके गई हुई थीं, तो तुलसीदास उनसे मिलने के लिए व्याकुल हो उठे। रात के अंधेरे में, बारिश हो रही थी, वे उनसे मिलने निकल पड़े। एक साँप को रस्सी समझकर नदी पार की और एक मरे हुए व्यक्ति को पालकी समझकर उस पर चढ़ गए। जब वे रत्नावली के कक्ष में पहुँचे तो उन्होंने यह सब देखकर तुलसीदास को फटकार लगाई।

रत्नावली ने कहा – “लाज न आई आपको दौरे आएहु नाथ। अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति।। नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत।।”

अर्थात: “हे नाथ! आपको लाज नहीं आई, इस तरह मेरे पास चले आए? यह शरीर हड्डी और चर्म का पुतला है, जिससे आपको इतना प्रेम है। यदि आपको भगवान राम से इतना प्रेम होता, तो आपको संसार के भय से मुक्ति मिल गई होती।”

3.3 संन्यास की ओर अग्रसर:
पत्नी के इन कठोर परंतु सत्य वचनों ने तुलसीदास के हृदय में ऐसा आघात किया कि उनका मोह भंग हो गया। उन्हें वैराग्य का बोध हुआ और उन्होंने तत्काल गृहस्थ जीवन का त्याग कर दिया। वे सन्यास ग्रहण करके भगवान राम की भक्ति और जनकल्याण के पथ पर निकल पड़े।


अध्याय 4: तुलसीदास की प्रमुख रचनाएँ (Tulsidas Ki Rachnayen)

तुलसीदास जी एक अत्यंत плодовитый रचनाकार थे। माना जाता है कि उन्होंने 37 ग्रंथों की रचना की, जिनमें से 12 प्रमाणिक माने जाते हैं।

4.1 रामचरितमानस (Ramcharitmanas):
यह तुलसीदास जी की सर्वाधिक प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण रचना है। इसे ‘तुलसीकृत रामायण’ या simply ‘मानस’ के नाम से भी जाना जाता।

  • रचना काल: इसे मान्यतानुसार संवत 1631 (1574 ईस्वी) में अयोध्या में लिखना प्रारंभ किया और दो वर्ष, सात महीने और 26 दिन में संवत 1633 (1576 ईस्वी) में काशी में पूर्ण किया।

  • भाषा: अवधी

  • छंद: दोहा और चौपाई

  • कथा सार: इसमें भगवान राम के चरित्र का मानस (मन के समान श्रेष्ठ सरोवर) रूपी वर्णन है। यह सात कांडों (बाल कांड, अयोध्या कांड, अरण्य कांड, किष्किंधा कांड, सुन्दर कांड, लंका कांड, उत्तर कांड) में विभाजित है।

  • विशेषता: यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि समाज दर्शन, नीति, राजनीति, मनोविज्ञान और आदर्श जीवन के सभी पहलुओं का विश्वकोश है।

4.2 विनय पत्रिका (Vinay Patrika):
यह तुलसीदास जी की दूसरी सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है।

  • भाषा: ब्रजभाषा

  • सार: इसमें 279 पद संकलित हैं। यह भगवान राम को लिखी गई एक ‘विनय-पत्र’ (गुहार-पत्र) के समान है। इसमें तुलसीदास जी ने अपने जीवन की व्याधियों, समस्याओं और भक्ति की गहन अनुभूतियों को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है।

4.3 कवितावली (Kavitavali):
इसकी रचना भी ब्रजभाषा में हुई है। इसमें राम-कथा को कवित्त और सवैया छंदों में कहा गया है। यह रामचरितमानस का एक प्रकार से काव्यात्मक सारांश है।

4.4 गीतावली (Geetavali):
ब्रजभाषा में रचित इस ग्रंथ में राम-कथा को गेय पदों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसके पदों में गेयता और भावुकता की प्रधानता है।

4.5 दोहावली (Dohavali):
इसमें 573 दोहे संग्रहित हैं। ये दोहे नीति, भक्ति और समाजिक व्यवहार के उत्कृष्ट सूत्र हैं।

4.6 हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa):
यह तुलसीदास जी की सर्वाधिक लोकप्रिय और सरल रचना है। इसमें 40 चौपाइयों में हनुमान जी के गुणों, कार्यों और महिमा का वर्णन है। यह हिंदू धर्म में अत्यंत श्रद्धा से पढ़ा जाने वाला स्तोत्र है।

4.7 अन्य रचनाएँ:

  • कृष्ण गीतावली

  • बरवै रामायण

  • पार्वती मंगल

  • जानकी मंगल

  • रामलला नहछू


अध्याय 5: रामचरितमानस: एक सांस्कृतिक महाकाव्य

रामचरितमानस केवल एक किताब नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस की आत्मा की अभिव्यक्ति है।

5.1 रचना का उद्देश्य:
तुलसीदास जी ने स्वयं लिखा है – “सब भाँति सुभ गुन सील सनेहू। सकल महिमा गुन कर जस देहू।।” अर्थात, वे राम के सभी गुण, शील, स्नेह और समस्त महिमा का वर्णन करना चाहते थे। उनका मुख्य उद्देश्य था – लोकमंगल। उन्होंने संस्कृत के जटिल शास्त्रों में छिपे राम के संदेश को आम जनता की भाषा (अवधी) में पहुँचाकर एक क्रांतिकारी कार्य किया।

5.2 दार्शनिक आधार:
रामचरितमानस विशिष्टाद्वैत वेदांत के दर्शन पर आधारित है। इसमें राम को निर्गुण ब्रह्म के सगुण स्वरूप के रूप में चित्रित किया गया है। भक्ति, ज्ञान और कर्म का अद्भुत समन्वय इस ग्रंथ में देखने को मिलता है।

5.3 सामाजिक प्रभाव:
मानस ने भारतीय समाज के ढाँचे को गहराई से प्रभावित किया।

  • इसने आदर्श पुत्र (राम), आदर्श पति (राम), आदर्श भाई (लक्ष्मण, भरत), आदर्श सेवक (हनुमान), आदर्श राजा (राम) और आदर्श नारी (सीता) के चरित्रों को स्थापित किया।

  • इसने भक्ति आंदोलन को एक नई गति और दिशा दी।

  • यह हिंदू घरों में एक पवित्र ग्रंथ के रूप में स्थापित हुआ और इसके पाठ, रामलीला आदि सामूहिक सांस्कृतिक कार्यक्रम बन गए।

5.4 साहित्यिक विशेषताएँ:

  • अलंकार योजना: उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का सहज और सुंदर प्रयोग।

  • भाषा शैली: अवधी भाषा की माधुर्य और सरलता।

  • छंद योजना: चौपाइयों और दोहों का प्रवाहमय प्रयोग।

  • लोक जीवन का चित्रण: ग्राम्य जीवन, प्रकृति और सामान्य जन के व्यवहार का सजीव चित्रण।


अध्याय 6: तुलसीदास का भक्ति दर्शन

तुलसीदास जी की भक्ति सगुण और निर्गुण दोनों ही रूपों में अभिव्यक्त हुई है, लेकिन उनकी प्रमुख भक्ति सगुण राम-भक्ति है।

6.1 राम का स्वरूप:
तुलसीदास के लिए राम साकार ईश्वर हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, लेकिन साथ ही वे निराकार ब्रह्म के भी प्रतीक हैं। वे कहते हैं – “प्रनवउँ प्रभु अवधपुरधामा। अज अभय चरन जासु नामा।।” (मैं अयोध्यापति प्रभु राम को प्रणाम करता हूँ, जो अजन्मा और अभय हैं)।

6.2 भक्ति के प्रकार:
तुलसीदास ने नौ प्रकार की भक्ति का वर्णन किया है – श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। लेकिन उनकी अपनी भक्ति दास्य भाव की है। वे स्वयं को राम का दास मानते हैं।

6.3 कर्म और गुरु का स्थान:
तुलसीदास के दर्शन में गुरु की अनिवार्यता पर बल दिया गया है। गुरु के बिना मोक्ष संभव नहीं है। साथ ही, वे निष्काम कर्म के पक्षधर हैं। मनुष्य को अपना कर्तव्य करते रहना चाहिए, फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए।

6.4 जाति-पाति का उल्लंघन:
तुलसीदास ने भक्ति के मार्ग में जाति-पाति के भेद को नकारा है। शबरी के बेर, निषादराज की भक्ति, केवट की सेवा – ये सभी प्रसंग इस बात के प्रमाण हैं कि भक्ति सबके लिए खुली है।


अध्याय 7: तुलसीदास और समकालीन संत

तुलसीदास जी का समय भारत में भक्ति आंदोलन का स्वर्ण युग था।

7.1 सूरदास:
सूरदास कृष्ण-भक्ति के प्रमुख कवि थे, जबकि तुलसीदास राम-भक्ति के। दोनों ने ब्रजभाषा को समृद्ध किया। सूरदास की भक्ति में वात्सल्य और श्रृंगार का पुट है, वहीं तुलसीदास की भक्ति में मर्यादा और आदर्श का।

7.2 कबीर दास:
कबीर दास निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे और उन्होंने रूढ़िवादी रीति-रिवाजों का खुलकर विरोध किया। तुलसीदास ने सगुण उपासना पर बल दिया और वैदिक परंपरा के समर्थक रहे। फिर भी, दोनों ने ही ईश्वर की एकता और भक्ति के महत्व को स्वीकार किया।

7.3 मीराबाई:
मीराबाई की कृष्ण-भक्ति में माधुर्य भाव की प्रधानता थी, जबकि तुलसीदास की भक्ति दास्य भाव की है।

इन सभी संतों ने मिलकर हिंदी साहित्य और भारतीय духовность को अमर धरोहर प्रदान की।


अध्याय 8: मृत्यु और विरासत

8.1 अंतिम समय:
मान्यता है कि तुलसीदास जी का संवत 1680 (सन 1623 ईस्वी) में वाराणसी के असी घाट पर स्वर्गवास हुआ। उनके अंतिम समय की एक प्रसिद्ध घटना है कि जिस समय वे राम-नाम का जाप कर रहे थे, उसी समय उन्होंने देह त्याग दिया।

8.2 तुलसीदास की अमर विरासत:
तुलसीदास जी की विरासत आज भी जीवंत है।

  • रामचरितमानस हिंदू धर्म का सबसे अधिक पढ़ा और पूजा जाने वाला ग्रंथ है।

  • हनुमान चालीसा का पाठ करोड़ों लोग नियमित रूप से करते हैं।

  • उनकी रचनाएँ भारतीय नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों की आधारशिला हैं।

  • उन्होंने हिंदी साहित्य को जो ऊँचाई दी, वह अद्वितीय है। उन्हें ‘हिंदी का शेक्सपियर’ कहा जाता है।


निष्कर्ष

“तुलसीदास का जीवन परिचय” (Tulsidas Ka Jivan Parichay) के इस विस्तृत अध्ययन से स्पष्ट होता है कि तुलसीदास जी केवल एक कवि नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक, दार्शनिक और आध्यात्मिक चिंतक थे। उन्होंने अपने जीवन के संघर्षों को भक्ति में बदल दिया और एक ऐसा साहित्यिक सागर रचा, जिसकी हर बूंद में जीवन का अमृत समाया हुआ है। आज भी जब कोई “मानस” का पाठ करता है या “हनुमान चालीसा” का उच्चारण करता है, तो तुलसीदास जी की वह अमर वाणी उसे आंतरिक शक्ति और शांति प्रदान करती है। वे सच्चे अर्थों में भारतीय संस्कृति के स्तंभ और करोड़ों लोगों के आराध्य गुरु हैं।

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Satish Kumar Is A Journalist With Over 10 Years Of Experience In Digital Media. He Is Currently Working As Editor At Aman Shanti, Where He Covers A Wide Variety Of Technology News From Smartphone Launches To Telecom Updates. His Expertise Also Includes In-depth Gadget Reviews, Where He Blends Analysis With Hands-on Insights.
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