West Asia की जंग का असर अब इंटरनेट पर! सिर्फ पेट्रोल नहीं, भारत की डिजिटल लाइफ भी खतरे में, जानिए

aditisingh
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Iran-Israel War: पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को फिर चर्चा में ला दिया है. अब तक इसे मुख्य रूप से ऊर्जा आपूर्ति के लिए अहम माना जाता था लेकिन 2026 में यह एक बड़ा डिजिटल चोकपॉइंट भी बनकर उभरा है. भारत के लिए यह जगह दोहरी चुनौती पेश करती है एक तरफ यहीं से देश में बड़ी मात्रा में तेल और गैस आती है तो दूसरी ओर इंटरनेट डेटा ले जाने वाली समुद्र के नीचे बिछी केबल्स भी इसी क्षेत्र से गुजरती हैं. जैसे-जैसे पश्चिम एशिया में युद्ध की स्थिति गंभीर होती जा रही है भारत के लिए जोखिम भी बढ़ता दिखाई दे रहा है.

समुद्र के नीचे बिछी केबल्स पर खतरा

आज दुनिया का लगभग 99 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय डेटा समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबल्स के जरिए भेजा जाता है. भारत का एक बड़ा हिस्सा, खासकर पश्चिमी देशों से आने वाला इंटरनेट ट्रैफिक, खाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरता है. मुंबई और चेन्नई को यूरोप और पश्चिम एशिया से जोड़ने वाली कई महत्वपूर्ण केबल प्रणालियां इसी मार्ग से गुजरती हैं. इनमें SEA-ME-WE 4, I-ME-WE और FALCON जैसी केबल्स शामिल हैं. ये केबल्स भारत के डिजिटल नेटवर्क की रीढ़ मानी जाती हैं.

हालांकि हालात बिगड़ने के कारण इन केबल्स की मरम्मत और रखरखाव में दिक्कत आ रही है. 2025 के अंत में जेद्दा के पास कुछ केबल्स में खराबी आने के बाद मरम्मत का काम शुरू हुआ था लेकिन मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे के चलते मरम्मत जहाजों को काम रोकना पड़ा. अगर ऐसी स्थिति में कोई केबल कट जाती है तो इंटरनेट की स्पीड कम हो सकती है और वित्तीय लेन-देन या डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है.

ऊर्जा आपूर्ति पर भी बढ़ रहा दबाव

भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी बड़े पैमाने पर तेल और गैस के आयात पर निर्भर है. मार्च 2026 तक भारत के लगभग 50 से 55 प्रतिशत कच्चे तेल और आधे से ज्यादा एलएनजी (LNG) शिपमेंट इसी समुद्री रास्ते से गुजरते हैं.

लेकिन युद्ध के चलते इस रास्ते पर जहाजों की आवाजाही काफी कम हो गई है. कई टैंकर सुरक्षा कारणों से जलडमरूमध्य के बाहर ही रुक रहे हैं. इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है.

एलएनजी के मामले में स्थिति और संवेदनशील है क्योंकि भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता कतर है. अगर यह रास्ता लंबे समय तक बाधित रहता है तो बिजली उत्पादन और उर्वरक उद्योग जैसी अहम सेक्टर प्रभावित हो सकते हैं. फिलहाल सरकार के पास सीमित समय के लिए तेल और ईंधन का भंडार मौजूद है लेकिन लंबे संकट की स्थिति में चुनौती बढ़ सकती है.

अर्थव्यवस्था और आईटी सेक्टर पर संभावित असर

इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल बाजार भी प्रभावित हो रहा है और कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. अगर स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो भारत की अर्थव्यवस्था और मुद्रा पर दबाव बढ़ सकता है.

इसके अलावा भारत का आईटी और डिजिटल सर्विस सेक्टर भी इस स्थिति से प्रभावित हो सकता है. अगर डेटा ट्रैफिक में बाधा आती है तो रिमोट वर्क और ऑनलाइन सेवाओं पर असर पड़ सकता है.

नए विकल्पों की तलाश में भारत

इस चुनौती से निपटने के लिए भारत सरकार ऊर्जा स्रोतों और व्यापार मार्गों को विविध बनाने की कोशिश कर रही है. रूस, अमेरिका और अन्य देशों से तेल आयात बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है. साथ ही भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स को भी रणनीतिक विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है.

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Satish Kumar Is A Journalist With Over 10 Years Of Experience In Digital Media. He Is Currently Working As Editor At Aman Shanti, Where He Covers A Wide Variety Of Technology News From Smartphone Launches To Telecom Updates. His Expertise Also Includes In-depth Gadget Reviews, Where He Blends Analysis With Hands-on Insights.