Explained: यूएस से ट्रेड डील के बाद 50% से हुआ 18% टैरिफ, भारत के लिए कितनी बड़ी खुशी की बात?

सतीश कुमार
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India US Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से ट्रेड डील को लेकर बातचीत चल रही थी, लेकिन लगातार बातचीत के बावजूद कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पा रहा था. इस दौरान अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत तक का हाई टैरिफ लगा दिया था, जिसका सीधा असर भारत के कई एक्सपोर्ट सेक्टर्स पर पड़ा. हालात इतने खराब हो गए थे कि सरकार को प्रभावित उद्योगों को बेलआउट पैकेज देकर नुकसान की भरपाई करनी पड़ रही थी.

इसी बीच सोमवार देर रात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक ऐलान कर दिया कि भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ में बड़ी कटौती की जा रही है और अब यह घटकर सिर्फ 18 प्रतिशत रह जाएगा. इस घोषणा ने भारतीय उद्योग जगत और एक्सपोर्टर्स को बड़ी राहत दी. इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस ट्रेड डील की पुष्टि की.

यह समझौता ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत पहले ही ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन (EU) के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर कर चुका है. ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि अमेरिका के साथ डील पर अचानक मुहर कैसे लग गई, ट्रंप क्यों मान गए और इससे भारत को असल में कितना फायदा होगा?

ट्रेड डील से क्या फायदा?

आईआईएमसी के प्रोफेसर शिवाजी सरकार के मुताबिक, इस डील के बाद भारत पर अमेरिकी टैरिफ की दर 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत जरूर हो गई है, लेकिन यह राहत पूरी तरह संतोषजनक नहीं है. दरअसल, अमेरिका में सामान्य टैरिफ दरें करीब 5 प्रतिशत के आसपास होती हैं. ऐसे में भारत पर अब भी सामान्य दरों से कहीं ज्यादा टैक्स लगाया जा रहा है.

उनका कहना है कि बदले हुए हालात में भारत के एक्सपोर्ट पहले के मुकाबले महंगे हो जाएंगे. इसका सीधा असर अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग पर पड़ सकता है. एक्सपोर्टर्स को प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए अपनी कीमतों में बदलाव करना होगा, जो आसान नहीं होगा. यानी राहत तो मिली है, लेकिन चुनौती अभी भी बनी हुई है.

भारत पर एक और दबाव

शिवाजी सरकार के अनुसार, टैरिफ में कटौती के साथ-साथ भारत पर एक नया दबाव भी बनाया गया है. इस समझौते के तहत भारत को अमेरिका से करीब 500 बिलियन डॉलर का आयात करना होगा. यह आयात एक साल या किसी तय समय सीमा में नहीं, बल्कि कुल वैल्यू के रूप में होगा, लेकिन फिर भी यह भारत के लिए बड़ा आर्थिक दायित्व है.

इस आयात में वेनेजुएला का कच्चा तेल भी शामिल है, जिसकी क्वालिटी दूसरे स्रोतों की तुलना में बेहतर नहीं मानी जाती. यह हैवी क्रूड ऑयल होता है, जिसे रिफाइन करना महंगा पड़ता है. भारत की सभी रिफाइनरियां इसके लिए उपयुक्त नहीं हैं, सिर्फ एक-दो रिफाइनरियां ही इसे प्रोसेस कर सकती हैं.

इसके अलावा, वेनेजुएला का तेल आमतौर पर अमेरिका के ईस्ट कोस्ट और आसपास के इलाकों में रिफाइन किया जाता है. ऐसे में अमेरिका या दक्षिण अमेरिका से तेल मंगाने की लॉजिस्टिक लागत भी बढ़ जाती है, जो भारत पर अतिरिक्त बोझ डालती है.

क्या यह सौदा महंगा पड़ेगा?

इस पूरे समीकरण का एक अहम पहलू घरेलू उपभोक्ता भी हैं. जब आयात और उत्पादन की लागत बढ़ती है, तो सरकार के सामने यह बड़ी चुनौती होती है कि वह घरेलू उपभोक्ताओं को कितनी राहत दे पाएगी.

इसके अलावा, भारत पहले रूस से सस्ता कच्चा तेल मंगवा रहा था, जिससे कुछ कंपनियों को फायदा जरूर हुआ, लेकिन आम उपभोक्ताओं तक उसका लाभ सीमित ही पहुंच पाया. ट्रंप ने इस मुद्दे पर यह भी कहा कि रूस से तेल खरीदना यूक्रेन युद्ध की परोक्ष फंडिंग है और अब इस ट्रेड डील के बाद युद्ध खत्म होने की संभावना है.

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Satish Kumar Is A Journalist With Over 10 Years Of Experience In Digital Media. He Is Currently Working As Editor At Aman Shanti, Where He Covers A Wide Variety Of Technology News From Smartphone Launches To Telecom Updates. His Expertise Also Includes In-depth Gadget Reviews, Where He Blends Analysis With Hands-on Insights.