Ex-Showroom vs On-Road Price: नई गाड़ी खरीदने से पहले जानें कीमत में इतना बड़ा अंतर क्यों होता है?


Ex-Showroom vs On-Road Price: नई गाड़ी खरीदने का सपना हर किसी का होता है, लेकिन जब हम शोरूम पर जाते हैं, तो बजट का गणित पूरी तरह बदल जाता है. विज्ञापन में दिखने वाली कीमत और जेब से कटने वाली रकम में जमीन-आसमान का अंतर होता है. इस अंतर की मुख्य वजह है ‘एक्स-शोरूम’ (Ex-Showroom) और ‘ऑन-रोड’ (On-Road) कीमत के बीच का फासला.

दरअसल, एक्स-शोरूम कीमत वह मूल रकम है, जिस पर कंपनी गाड़ी बेचती है. इसमें केवल फैक्ट्री कॉस्ट, डीलर का प्रॉफिट और जीएसटी (GST) शामिल होता है. लेकिन गाड़ी को सड़क पर कानूनी रूप से चलाने के लिए कई अनिवार्य टैक्स और चार्ज चुकाने पड़ते हैं. यही वजह है कि कार या बाइक की शोरूम कीमत और फाइनल बिल में 15% से 25% तक का बड़ा गैप आ जाता है, जो ग्राहकों को अक्सर हैरान कर देता है. आइए जानते हैं कि बीच का पैसा कहां जाता है?

एक्स-शोरूम और ऑन-रोड के बीच कितना अंतर?

जब आप कोई नई गाड़ी खरीदते हैं, तो बेस प्राइस के ऊपर कई तरह के सरकारी और गैर-सरकारी शुल्क जुड़ते हैं. आइए समझते हैं कि आपके बिल की एक-एक पाई कहां जाती है:

1. रोड टैक्स (Road Tax / RTO Fees)

ये इस गैप का सबसे बड़ा हिस्सा होता है. राज्य सरकारें सड़कों के रखरखाव और बुनियादी ढांचे के लिए हर नए वाहन पर रोड टैक्स वसूलती हैं. ये टैक्स अलग-अलग राज्यों में गाड़ी की कीमत, इंजन क्षमता (cc) और ईंधन के प्रकार (पेट्रोल/डीजल/इलेक्ट्रिक) के आधार पर 6% से लेकर 20% तक हो सकता है. इसके अलावा, रजिस्ट्रेशन फीस और नंबर प्लेट (HSRP) का चार्ज भी इसी में जुड़ता है.

2. वाहन बीमा (Vehicle Insurance)

भारत में सड़क पर गाड़ी चलाने के लिए इंश्योरेंस होना कानूनी रूप से अनिवार्य है. थर्ड पार्टी इंश्योरेंस मेंडेटरी रखा गया है. सरकार के नियम के मुताबिक नई कार के लिए 3 साल और टू-व्हीलर के लिए 5 साल का थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस एक साथ लेना जरूरी होता है. इसके अलावा, खुद की गाड़ी के नुकसान की भरपाई के लिए लोग 1 साल का व्यापक (Comprehensive) बीमा भी लेते हैं. इन दोनों को मिलाकर बीमा प्रीमियम एक मोटी रकम बन जाता है.

3. टीसीएस (TCS – Tax Collected at Source)

आयकर विभाग के नियमों के अनुसार, यदि किसी गाड़ी की एक्स-शोरूम कीमत 10 लाख रुपये से अधिक है, तो सरकार उस पर 1% का TCS वसूलती है. हालांकि, इसे आप बाद में अपना इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करते समय क्लेम कर सकते हैं, लेकिन गाड़ी खरीदते वक्त ये ऑन-रोड कीमत को बढ़ा देता है.

4. फास्टैग और ग्रीन सेस (Fastag & Green Cess)

नेशनल हाईवे पर टोल प्लाजा से गुजरने के लिए हर नई गाड़ी में फास्टैग अनिवार्य है, जिसके लिए करीब 400 से 600 रुपये लिए जाते हैं. कई राज्यों में पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने के नाम पर खासकर डीजल गाड़ियों पर अतिरिक्त ग्रीन सेस लगाया जाता है.

डीलर के हिडेन चार्ज

कुछ खर्चे ऐसे होते हैं जो जरूरी नहीं हैं, लेकिन डीलर इन्हें ऑन-रोड प्राइस लिस्ट में जोड़कर देते हैं. ग्राहकों को इसकी जानकारी होना बेहद जरूरी है:

  • लॉजिस्टिक्स या हैंडलिंग चार्ज: गाड़ी को यार्ड से शोरूम तक लाने का खर्च. सुप्रीम कोर्ट इसे अवैध घोषित कर चुका है, इसलिए आप इसे हटाने की मांग कर सकते हैं.
  • एक्सेसरीज किट: कार मैट, सीट कवर, क्रोम गार्निश जैसी चीजें डीलर पहले से जोड़ देते हैं. आप चाहें तो इन्हें लेने से मना कर सकते हैं.
  • एक्सटेंडेड वारंटी: कंपनी की स्टैंडर्ड वारंटी के अलावा अतिरिक्त सालों की वारंटी, जो वैकल्पिक (Optional) होती है, आप इसे भी हटवा सकते हैं.

काम की सलाह: अगली बार जब आप गाड़ी खरीदने जाएं, तो डीलर से ऑन-रोड प्राइस का आइटमवाइज ब्रेकअप (Item-wise Breakup) मांगें. बीमा आप बाहर से किसी अन्य कंपनी से सस्ते में भी करवा सकते हैं, जिसके लिए डीलर आपको मजबूर नहीं कर सकता. समझदारी दिखाकर आप ऑन-रोड कीमत में हजारों रुपये की बचत कर सकते हैं.



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