भारत का कार बाजार तेजी से बढ़ रहा है. SUV की मांग रिकॉर्ड स्तर पर है, लोग नई टेक्नोलॉजी और बेहतर फीचर्स वाली कारें खरीद रहे हैं और कंपनियां लगातार नए मॉडल उतार रही हैं. लेकिन इस बढ़ते बाजार में चार यूरोपीय मास-मार्केट ब्रांड्स की कहानी उलटी है. Skoda, Volkswagen, Renault और Citroen ने भारत में लोकलाइजेशन बढ़ाया, नए मॉडल लॉन्च किए और SUV सेगमेंट में उतरने की कोशिश की. इसके बावजूद इन चारों की कुल बिक्री और बाजार हिस्सेदारी घट गई. यानी भारत का कार बाजार बढ़ा, लेकिन इन कंपनियों का हिस्सा उस बढ़ती हुई पाई में और छोटा होता गया.
FY23 में भारत में कुल पैसेंजर व्हीकल की बिक्री करीब 38.90 लाख यूनिट थी. FY26 तक यह बढ़कर 46.43 लाख यूनिट हो गई. यानी तीन साल में बाजार में करीब 7.5 लाख अतिरिक्त कारों की बिक्री जुड़ गई. कुल बाजार करीब 19% बढ़ा. लेकिन इसी दौरान Skoda, Volkswagen, Renault और Citroen की संयुक्त बिक्री 1.82 लाख से घटकर 1.65 लाख यूनिट रह गई. इसका सीधा असर बाजार हिस्सेदारी पर पड़ा. FY23 में इन चारों की संयुक्त हिस्सेदारी 4.67% थी. FY26 में यह घटकर सिर्फ 3.55% रह गई. यानी जिस बाजार में मौके लगातार बढ़ रहे थे, उसमें इन कंपनियों की पकड़ कमजोर होती गई.
असली परेशानी SUV में
ऑटो मार्केट की दिशा अब काफी हद तक SUV तय कर रही है. FY26 में भारत में कॉम्पैक्ट SUV की बिक्री करीब 11.95 लाख यूनिट रही. यह SUV बिक्री का करीब 44.76% और पूरे पैसेंजर व्हीकल बाजार का 25.39% था.यानी अगर किसी कंपनी को भारत में बड़ी मात्रा में कारें बेचनी हैं, तो SUV पोर्टफोलियो मजबूत होना बेहद जरूरी है.
यहीं यूरोपीय ब्रांड्स कमजोर पड़ते हैं. Volkswagen और Citroen के पास फिलहाल कॉम्पैक्ट SUV नहीं है. Skoda के पास Kylaq और Renault के पास Kiger है.
लेकिन बिक्री का अंतर देखिए
अप्रैल-जुलाई FY27 में Skoda Kylaq की बिक्री 15,289 यूनिट रही. इसी अवधि में Tata Nexon की बिक्री 73,032, Maruti Suzuki Brezza की 49,543 और Hyundai Venue की 46,005 यूनिट रही. Renault Kiger सिर्फ 2,575 यूनिट बेच पाई. यानी जिस सेगमेंट में सबसे ज्यादा ग्राहक हैं, वहां यूरोपीय कंपनियां अभी उस स्तर की मात्रा नहीं बना पा रही हैं.
मिड-साइज SUV में भी बड़ा अंतर
मिड-साइज SUV सेगमेंट भी भारतीय कार बाजार का बड़ा हिस्सा बन चुका है. इसमें Skoda Kushaq, Volkswagen Taigun और Renault Duster जैसे मॉडल मौजूद हैं. अप्रैल-जुलाई FY27 के दौरान Taigun की बिक्री 5,231 यूनिट, Duster की 5,149 यूनिट और Kushaq की 4,986 यूनिट रही. Citroen के BasaltX और AircrossX ने मिलकर सिर्फ 413 यूनिट जोड़ीं. इन पांच यूरोपीय मॉडलों की कुल बिक्री करीब 15,779 यूनिट रही.
अब इसकी तुलना Hyundai Creta से
अकेली Creta ने इसी अवधि में 55,782 यूनिट बेच दीं. Maruti Suzuki Victoris की बिक्री 45,923 और Kia Seltos की 43,358 यूनिट रही.
यानी समस्या यह नहीं है कि यूरोपीय कंपनियों की कारें SUV बाजार में मौजूद नहीं हैं. समस्या यह है कि उनकी बिक्री का पैमाना बहुत छोटा है.
95% लोकलाइजेशन के बाद भी फायदा क्यों नहीं?
अगर समस्या विदेशी कार होने की है तो कंपनियों ने लोकलाइजेशन क्यों नहीं बढ़ाया? असल में उन्होंने ऐसा किया है. Renault का कहना है कि भारत में उसके लोकल प्रोडक्शन वाले वाहनों में 95% से ज्यादा लोकलाइजेशन है.
Skoda की Kylaq, Kushaq और Slavia तथा Volkswagen की Taigun और Virtus भारत के लिए तैयार MQB-A0-IN प्लेटफॉर्म पर आधारित हैं और इनमें भी करीब 95% लोकलाइजेशन है. लेकिन लोकलाइजेशन का मतलब अपने आप बड़ी बिक्री नहीं है.
कार स्थानीय स्तर पर बन सकती है, लेकिन ग्राहक उसे तभी खरीदेगा जब कीमत, फीचर्स, सर्विस, माइलेज, रीसेल और भरोसा उसके हिसाब से सही बैठें. यही वह जगह है जहां यूरोपीय ब्रांड्स को अभी लंबा रास्ता तय करना है.
कुछ कारों पर बहुत ज्यादा निर्भरता
इन कंपनियों के पोर्टफोलियो को देखें तो एक और समस्या दिखाई देती है. Skoda, Volkswagen और Citroen भारत में पांच-पांच मॉडल पेश करते हैं, जबकि Renault के पास चार मॉडल हैं. लेकिन इनका पूरा पोर्टफोलियो समान ताकत से नहीं बिकता.
अप्रैल-जुलाई FY27 में Volkswagen की घरेलू बिक्री का 96.4% हिस्सा Virtus और Taigun से आया. Skoda के मामले में Kylaq, Kushaq और Slavia ने मिलकर 97.8% बिक्री दी. यानी अगर इन कुछ मॉडलों की बिक्री कमजोर पड़ती है तो पूरी कंपनी की बिक्री पर सीधा असर पड़ता है. इसके उलट भारत की बड़ी कंपनियों के पास अलग-अलग कीमत और सेगमेंट में ज्यादा व्यापक पोर्टफोलियो है.
ग्राहक सिर्फ कार नहीं, पूरा पैकेज खरीद रहा
- आज भारतीय ग्राहक कार खरीदते समय सिर्फ डिजाइन या इंजन नहीं देखता.
- सर्विस सेंटर कहां है?
- स्पेयर पार्ट कितने महंगे हैं?
- मेंटेनेंस का खर्च कितना आएगा?
- पांच साल बाद कार कितने में बिकेगी?
एक्सपर्ट क्या कह रहे
मनीकंट्रोल ने GlobalData के Vivek Sharma से बात की और यही सवाल पूछा. उनके मुताबिक, भारतीय बाजार में सफल होने के लिए सिर्फ अच्छी कार बनाना काफी नहीं है. कंपनियों को आक्रामक कीमत, ज्यादा लोकलाइजेशन, मजबूत SUV पोर्टफोलियो और बड़ा बिक्री-सर्विस नेटवर्क चाहिए. यानी ग्राहक का भरोसा अब सिर्फ showroom में कार देखकर नहीं बनता. वह खरीदने के बाद की पूरी ownership experience देखता है.
भारतीय ग्राहक SUV और टेक्नोलॉजी की तरफ
Grant Thornton Bharat के एक सर्वे में 2,500 से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया था. इसमें 64% लोगों ने SUV को पसंदीदा बॉडी टाइप बताया. सुरक्षा 34% लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण खरीद कारक था, जबकि 65% लोगों ने टेक्नोलॉजी इंटीग्रेशन को महत्वपूर्ण माना.
इससे साफ है कि भारतीय कार खरीदार तेजी से बदल रहा है. उसे SUV चाहिए, सुरक्षा चाहिए, कनेक्टेड फीचर्स चाहिए और ऐसी कार चाहिए जिसकी ownership आसान हो.
यूरोपीय कंपनियों का टारगेट
- दिलचस्प बात यह है कि ये कंपनियां भारत से पीछे हटने की तैयारी नहीं कर रही हैं. Skoda Auto Volkswagen India ने दशक खत्म होने से पहले भारत के पैसेंजर व्हीकल बाजार में 5% हिस्सेदारी हासिल करने का लक्ष्य रखा है.
- Renault ने भी रणनीतिक तौर पर 5% बाजार हिस्सेदारी का लक्ष्य रखा है, हालांकि उसने इसे 2030 की समयसीमा से नहीं जोड़ा है.
- इसलिए अगली लड़ाई सिर्फ नई कार लॉन्च करने की नहीं होगी. इन कंपनियों को यह साबित करना होगा कि वे भारत के बड़े SUV बाजार के लिए पर्याप्त मॉडल ला सकती हैं, कीमत को प्रतिस्पर्धी रख सकती हैं, सर्विस नेटवर्क बढ़ा सकती हैं और ग्राहक को रीसेल और मेंटेनेंस को लेकर भरोसा दे सकती हैं.
असली लड़ाई अब स्केल की
भारत में यूरोपीय मास-मार्केट ब्रांड्स की समस्या को सिर्फ “लोकलाइजेशन कम है” कहकर समझना अब मुश्किल है. उन्होंने लोकलाइजेशन बढ़ाया है. नए मॉडल भी आए हैं. SUV में भी उनकी मौजूदगी है. लेकिन भारत का ऑटो बाजार अब इतना बड़ा और प्रतिस्पर्धी हो चुका है कि सिर्फ अच्छी कार बनाना पर्याप्त नहीं है. Maruti Suzuki, Hyundai, Tata Motors, Mahindra और Kia जैसे खिलाड़ी बड़े पैमाने पर SUV, कीमत, फीचर्स, सर्विस और रीसेल सबको एक साथ लेकर चल रहे हैं. यूरोपीय कंपनियों के सामने चुनौती यही है.
भारत में कारों की मांग बढ़ रही है, लेकिन उस बढ़ती मांग को बिक्री में बदलने के लिए सही SUV, सही कीमत, सही नेटवर्क और ग्राहक का भरोसा चारों एक साथ चाहिए. यहीं पर Skoda, Volkswagen, Renault और Citroen को भारतीय बाजार में सबसे ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है.