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School Phone Ban 2026: बच्चों की पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य बचाने के लिए स्कूलों में मोबाइल बैन क्यों जरूरी?

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By Aman Shanti .In On April 4, 2026
1 min read 1.2k views
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Phone Ban In Schools: फोन के बढ़ते यूज के कारण बच्चे ध्यान नहीं लगा पा रहे हैं. इसकी वजह से न सिर्फ उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है बल्कि उनकी मेंटल हेल्थ पर भी खराब असर पड़ रहा है. इसका एक नतीजा यह हो रहा है कि स्कूलों में फोन पर बैन लगाया जा रहा है. यूनिसेफ की एक ताजा रिपोर्ट से पता चलता है कि दुनिया के करीब 58 प्रतिशत देशों के स्कूलों में फोन पर पाबंदी लग चुकी है और इसमें तेजी से बढ़ोतरी हो रही है. 2023 में 24 प्रतिशत देशों के स्कूल में फोन बैन थे. 2025 की शुरुआत में यह आंकड़ा बढ़कर 40 प्रतिशत और इस साल 58 प्रतिशत हो गया है. 

स्कूलों में क्यों बैन हो रहे हैं फोन?

स्कूलों में फोन बैन होने के पीछे के सबसे बड़ा कारण क्लास में बच्चों का ध्यान भंग होना है. इसके अलावा साइबर बुलिंग और फोन के दूसरे नुकसानों के चलते भी स्कूलों में इस डिवाइस पर पाबंदी लगाई जा रही है. स्कूलों में फोन बैन करने के मामले में सेंट्रल और सदर्न एशियाई देश सबसे आगे ओशिनिया के देश (ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और फिजी आदि) सबसे पीछे हैं. हालांकि, कोलंबिया, एस्टोनिया, पेरू, सर्बिया और पोलैंड समेत कई ऐसे भी देश हैं, जिन्होंने फोन को पूरी तरह बैन करने की बजाय स्कूल में इनके लिए कड़ी पॉलिसी लागू कर दी है.

फोन होने से क्या फर्क पड़ता है?

रिपोर्ट्स के अनुसार, हंगरी के रिसर्चर ने इंटरनेशनल एक्सपीरियंस और हंगरी के स्कूलों की पॉलिसी को स्टडी किया है. इसमें सामने आया कि पॉलिसी लागू होने के बाद स्कूल टाइम में फोन का इस्तेमाल 37 प्रतिशत से घटकर 4 प्रतिशत पर आ गया है. टीचर्स ने भी बच्चों के बिहेवियर में बदलाव नोटिस किया है. फोन बैन होने के बाद बच्चे एक-दूसरे से अधिक कम्युनिकेशन कर रहे हैं, उनकी आउटडोर एक्टिविटी भी बढ़ी है और वो किताबें पढ़ने में ज्यादा रुचि लेने लगे हैं. हालांकि, इस बदलाव की दर बहुत कम है. करीब एक तिहाई टीचर्स ने बताया कि इससे बच्चों में पॉजीटिव बदलाव हुए हैं, जबकि 64 प्रतिशत टीचर्स का कहना है कि इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ा है.

सोशल मीडिया और ऑनलाइन दुनिया के बच्चों पर ये खतरे

स्कूलों में फोन बैन होने को बच्चों पर सोशल मीडिया के खतरों से जोड़कर भी देखा जा रहा है. कई रिपोर्ट्स में सामने आया है कि सोशल मीडिया के कारण स्कूली बच्चों और खासकर लड़कियों को हैरेसमेंट, सोशल प्रेशर और हार्मफुल कंटेट का सामना करना पड़ रहा है. फेसबुक की खुद की रिपोर्ट बताती है कि इंस्टाग्राम यूज करने के बाद 32 प्रतिशत टीनेज लड़कियों को अपने शरीर के बारे खराब महसूस हुआ है. टिकटॉक के एल्गोरिदम को लेकर और भी चौंकाने वाली जानकारी सामने आई थी. टिकटॉक हर 39 सेकंड पर टीनेज यूजर्स को बॉडी इमेज कंटेट और 8 मिनट बाद ईटिंग डिसऑर्डर से जुड़ा कंटेट दिखाता है.

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Սաթիշ Կումարը թվային բովանդակության ստեղծող և նորությունների հրատարակիչ է։ Նա գրում է հոդվածներ պետական ​​ծրագրերի, տեխնոլոգիական նորությունների և ավտոմոբիլային թարմացումների վերաբերյալ։ Նրա հոդվածների նպատակն է մարդկանց ճիշտ և արագ տեղեկատվություն տրամադրելը։