Jalebi History : भारतीय मिठाइयों की दुनिया एक ऐसा रंगीन और स्वाद से भरपूर बाज़ार है, जहाँ हर मिठाई का अपना एक इतिहास, अपनी एक कहानी है। इन्हीं में से एक है जलेबी – वह ख़ास मिठाई जिसकी खुशबू से ही मुँह में पानी भर आता है, जिसके लाजवाब स्वाद के आगे बच्चे ही नहीं, बड़े भी नहीं ठहर पाते। गोल-गोल, घुँघराले आकार में बनी, चटक पीले या केसरिया रंग की, और चाशनी में डूबी यह मिठाई न सिर्फ भारत बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में पसंद की जाती है। जलेबी को अक्सर गर्मागर्म, दही या रबड़ी के साथ परोसा जाता है, और यह हर तीज-त्योहार, शुभ अवसर और यहाँ तक कि साधारण दिन की शुरुआत का अहम हिस्सा है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह इतनी लोकप्रिय मिठाई आई कहाँ से? क्या यह हमेशा से भारतीय थी? इसका नाम ‘जलेबी’ कैसे पड़ा? इसके पीछे का इतिहास कितना पुराना है? आज हम इसी जलेबी के इतिहास (Jalebi History) की गहराइयों में उतरेंगे और जानेंगे कि कैसे एक अरबी डिश ‘ज़लाबिया’ भारत आकर ‘जलेबी’ बन गई और यहाँ की संस्कृति का अटूट हिस्सा बन गई।
जलेबी: एक परिचय
जलेबी एक ऐसी मिठाई है जिसे मैदा या बेसन के घोल को एक विशेष छिद्रयुक्त कलछी (झारना) से घी या तेल में तलकर बनाया जाता है। इस घोल को गोल-गोल, ज़िगज़ैग आकार में डाला जाता है, जो तलने के बाद कुरकुरी और केसरिया हो जाती है। फिर इन तली हुई जलेबियों को गरम चाशनी (शक्कर का घोल) में डुबोया जाता है, ताकि वह उसमें अच्छी तरह से रच-बस जाएं और मीठापन ले लें। आजकल तो जलेबी के कई रूप देखने को मिलते हैं – पारंपरिक जलेबी, इमरती (जो थोड़ी अलग होती है), मावा जलेबी, आइसक्रीम जलेबी आदि।
लेकिन जलेबी सिर्फ एक मिठाई नहीं, एक सांस्कृतिक प्रतीक है। यह गलियों-नुक्कड़ों की महक है, राह चलते ठहरने का कारण है, और दादी-नानी के प्यार का एहसास है। इस लेख में हम इसके इतिहास के पन्ने पलटेंगे।
अध्याय 1: प्राचीन काल में जलेबी की जड़ें – ज़लाबिया से जलेबी तक
जलेबी का इतिहास बेहद दिलचस्प और हैरान कर देने वाला है। यह मिठाई मूल रूप से भारतीय नहीं है। हैरानी की बात है न? दरअसल, जलेबी का जन्म स्थान मध्य पूर्व है, विशेष रूप से अरब देशों में।
प्राचीन नाम: ‘ज़लाबिया’ या ‘ज़लाबियाह’
जलेबी का मूल नाम है ‘ज़लाबिया’ (Zalabia) या ‘ज़लाबियाह’। यह शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘ज़ल्ब’ (Zalb) से बना है, जिसका अर्थ है ‘घाव से बहने वाला पानी’। हो सकता है कि जलेबी पर चाशनी की नमी या उसके बहते हुए स्वरूप को देखते हुए यह नाम दिया गया हो। कुछ विद्वान इसे फारसी शब्द ‘ज़ुल्बिया’ (Zulbia) से भी जोड़ते हैं, जिसका मतलब ‘घुमावदार’ या ‘कुंडलित’ होता है, जो जलेबी के आकार से सीधे मेल खाता है।
पहला ऐतिहासिक उल्लेख
जलेबी (या ज़लाबिया) का सबसे पुराना ज्ञात उल्लेख 10वीं-13वीं शताब्दी के दौरान मिलता है। प्रसिद्ध अरब पाक-विद (कुक) मुहम्मद बिन हसन अल-बगदादी ने 1226 ईस्वी में अपनी पाक-कला की किताब ‘किताब अल-तबीख’ (Kitab al-Tabikh) में ‘ज़लाबियाह’ नामक एक मिठाई का ज़िक्र किया है। उन्होंने इसे बनाने की विधि दी है, जो आज की जलेबी से काफी मिलती-जुलती है। इसमें आटे के घोल को छिद्रयुक्त बर्तन से तेल में तलकर शहद या चाशनी में डुबोया जाता था।
इसके अलावा, 14वीं शताब्दी में एक और किताब ‘किताब वस्फ अल-अतिमा अल-मुतादा’ में भी ज़लाबिया का उल्लेख मिलता है। यह स्पष्ट है कि मध्य पूर्व में यह मिठाई कई शताब्दियों से प्रचलित थी।
भारत आने का रास्ता: मध्य एशिया और फारस होते हुए
जलेबी भारत कैसे पहुँची? इसका रास्ता मध्य एशिया और फारस (आधुनिक ईरान) से होकर गुज़रता है। मध्य पूर्व से यह मिठाई व्यापारियों, यात्रियों और सैन्य अभियानों के ज़रिए ईरान पहुँची। ईरान में इसे ‘ज़ुल्बिया’ या ‘ज़ुलबिया’ कहा जाने लगा। फारसी संस्कृति में यह मिठाई खूब लोकप्रिय हुई।
फिर, मुग़ल काल में इसके भारत आने की सबसे अहम कड़ी जुड़ती है। मुग़ल सम्राट अपने साथ न सिर्फ सेना और प्रशासन, बल्कि कला, संस्कृति और पाककला भी लाए। ऐसा माना जाता है कि मुग़ल बादशाहों और उनके दरबार के शेफ़ (बावर्ची) इस मिठाई को भारत लाए। मुग़ल शासन काल (16वीं-18वीं शताब्दी) के दौरान फारसी पाककला का भारतीय रसोई पर गहरा प्रभाव पड़ा। जलेबी भी उन्हीं तोहफ़ों में से एक थी।
लेकिन यहाँ एक और रोचक तथ्य सामने आता है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जलेबी से मिलती-जुलती एक मिठाई का उल्लेख भारत में मुग़लों के आने से पहले भी मिलता है।
अध्याय 2: भारत में जलेबी – प्राचीन संदर्भ और ‘कुंडलिका’ का रहस्य
यहाँ पर जलेबी के इतिहास में एक दिलचस्प मोड़ आता है। क्या जलेबी भारत में मुग़लों से पहले भी थी? इस सवाल का जवाब शायद ‘हाँ’ में है।
संस्कृत ग्रंथों में मिलता है जिक्र
प्रसिद्ध जैन ग्रंथ ‘सूर्यप्रज्ञप्ति’ (जिसे ‘जैनभोजन’ भी कहा जाता है), जो पहली-दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का माना जाता है, में एक मिठाई का उल्लेख ‘कुंडलिका’ (Kundalika) या ‘कुंडलिका’ के नाम से मिलता है। इस ग्रंथ में उन व्यंजनों की सूची है जो जैन भिक्षुओं को भेंट में दिए जा सकते थे। ‘कुंडलिका’ का शाब्दिक अर्थ है ‘कुंडल की आकृति वाली’ या ‘घुमावदार’। कई इतिहासकार और पाक-इतिहासकार (जैसे के.टी. अच्युत) मानते हैं कि यह ‘कुंडलिका’ आज की जलेबी का ही एक प्राचीन रूप हो सकती है।
इसके अलावा, **गुजरात के प्रसिद्ध कवि और संत वल्लभाचार्य के पोते और मध्यकालीन भारत के महान कवि पृथ्वीराज रासो के रचयिता चंदबरदाई (12वीं शताब्दी) की एक रचना में भी ‘जलेबी’ शब्द मिलने का दावा किया जाता है, हालांकि यह विवादित है।
मध्यकालीन भारतीय ग्रंथ: ‘पद्मश्री निघंटु’
सबसे पुख़्ता सबूत 15वीं शताब्दी के एक ग्रंथ से मिलता है। 1538 ईस्वी में लिखे गए एक संस्कृत-हिंदी ग्रंथ ‘पद्मश्री निघंटु’ में ‘जलेबिका’ या ‘जलवल्लिका’ नामक एक मिठाई का स्पष्ट उल्लेख और उसकी विधि दी गई है। इस ग्रंथ के अनुसार, इसे आटे के घोल को छिद्रयुक्त पात्र से घी में तलकर और फिर पतले चाशनी में पकाकर बनाया जाता था। यह विवरण आधुनिक जलेबी से हूबहू मेल खाता है।
इसका मतलब स्पष्ट है कि 16वीं शताब्दी से पहले ही जलेबी या उसका एक स्पष्ट रूप भारत में मौजूद था और इसे ‘जलेबी’ जैसे नाम से जाना जाता था। इससे यह थ्योरी मज़बूत होती है कि जलेबी का विकास समानांतर रूप से भारत और मध्य पूर्व में हुआ होगा, या फिर बहुत पहले ही व्यापारिक संपर्कों के ज़रिए यह भारत पहुँच चुकी थी।
संभावना: एक सुंदर मिलन
सबसे संतुलित और स्वीकार्य मत यही है कि मध्य पूर्व की ‘ज़लाबिया’ और भारत की ‘कुंडलिका’/‘जलेबिका’ का मिलन मुग़ल काल में हुआ। मुग़ल दरबार के फारसी शेफ़ों ने अपनी ज़लाबिया बनाने की तकनीक और स्वाद (केसर, गुलाब जल आदि का प्रयोग) भारत लाया। भारत में पहले से मौजूद इसी तरह की मिठाई के साथ इस तकनीक के मेल से एक परिष्कृत, और भी स्वादिष्ट रूप सामने आया, जिसने अंततः आधुनिक जलेबी का स्वरूप ले लिया। यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक बेहतरीन उदाहरण है।
अध्याय 3: जलेबी शब्द का उद्भव और भाषाई यात्रा
जलेबी नाम कैसे बना? इसकी यात्रा बेहद रोचक है।
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अरबी: ज़लाबिया (Zalabia) > फारसी: ज़ुल्बिया (Zulbia) > हिंदुस्तानी (उर्दू/हिंदी): जलेबी (Jalebi)
फारसी में ‘ज़’ ध्वनि को हिंदुस्तानी भाषाओं में अक्सर ‘ज’ में बदल दिया जाता था। इस तरह ‘ज़ुल्बिया’ धीरे-धीरे बोलचाल में ‘जलेबी’ बन गया। भारत के विभिन्न हिस्सों में इसके नाम थोड़े बदल गए:
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उड़िया: जिलेबी
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बंगाली: जिलिपी
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नेपाली: जेर्री
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पंजाबी: जलेबी (ज्यादातर)
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तमिल: जिलाबी
अध्याय 4: जलेबी का भारतीयकरण और क्षेत्रीय विविधताएं
जलेबी भारत आई और यहाँ की होकर रह गई। भारत के विभिन्न क्षेत्रों ने इसे अपने अनूठे अंदाज़ में ढाल लिया, जिससे इसकी कई किस्में विकसित हुईं।
1. पारंपरिक उत्तर भारतीय जलेबी:
यह सबसे आम प्रकार है। इसे मैदा और बेसन के मिश्रण से बनाया जाता है। घोल को कुछ घंटों (या रात भर) के लिए खमीर उठने दिया जाता है, जिससे जलेबी में एक हल्की खटास और कुरकुरापन आता है। इसे केसर के रंग और खुशबू के लिए जाना जाता है। इसे अक्सर दही या रबड़ी के साथ परोसा जाता है।
2. बंगाली जिलिपी/जलेबी:
पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में जलेबी को ‘जिलिपी’ कहते हैं। यहाँ यह थोड़ी पतली और अधिक कुरकुरी बनाई जाती है। इसे अक्सर नाश्ते में लूची (पूरी) के साथ या फिर रसगुल्ले के साथ परोसा जाता है, जिसे ‘रसगुल्ले-जिलिपी’ कॉम्बो कहते हैं।
3. मावा जलेबी:
यह जलेबी की एक अमीर किस्म है। इसमें घोल में मैदे के साथ खोया (मावा) मिलाया जाता है, जिससे यह ज्यादा गहरे रंग की, मुलायम और भारी हो जाती है। यह अक्सर त्योहारों और विशेष अवसरों पर बनाई जाती है।
4. पंजाबी जलेबी:
पंजाब में जलेबी बेहद लोकप्रिय है। यहाँ इसे अक्सर घी में तला जाता है और गाढ़ी चाशनी में डुबोया जाता है। कई जगहों पर इसे गरमा-गरम दूध के साथ भी परोसा जाता है।
5. दक्षिण भारतीय जलेबी:
दक्षिण में, विशेष रूप से तमिल नाडु और केरल में, जलेबी को ‘जिलाबी’ कहा जाता है। यहाँ यह नाश्ते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और अक्सर वड़ा या इडली के साथ परोसी जाती है। इसे चाशनी में डुबोने के बजाय, कभी-कभी चाशनी में ही पकाया जाता है, जिससे यह नरम और रसीली हो जाती है।
6. इमरती: जलेबी की करीबी रिश्तेदार
इमरती को अक्सर जलेबी का ही एक रूप माना जाता है, लेकिन इसमें कुछ अंतर हैं। इमरती उड़द दाल के बेसन से बनाई जाती है और इसका आकार जलेबी से थोड़ा बड़ा और कम घना होता है। यह जलेबी की तुलना में कम मीठी और थोड़ी अलग बनावट वाली होती है। इमरती का इतिहास भी काफी पुराना माना जाता है।
अध्याय 5: जलेबी बनाने की पारंपरिक विधि और राज
पारंपरिक जलेबी बनाना एक कला है, जिसमें हाथ का अभ्यास और समय का ध्यान रखना ज़रूरी है। यहाँ है विस्तृत विधि:
सामग्री:
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मैदा – 1 कप
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बेसन (सूजी का बेसन बेहतर) – ¼ कप
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दही – ½ कप (खट्टी)
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पानी – आवश्यकतानुसार
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खाने का सोडा – एक चुटकी
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केसर – कुछ रेशे, गरम दूध में भिगोए हुए
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घी/तेल – तलने के लिए
चाशनी के लिए:
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चीनी – 2 कप
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पानी – 1 कप
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इलायची पाउडर – ½ छोटा चम्मच
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केसर – कुछ रेशे
विधि:
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खमीर उठाना: एक बड़े बाउल में मैदा, बेसन, दही और खाने का सोडा डालें। अच्छी तरह मिलाएं। अब धीरे-धीरे पानी मिलाकर एक गाढ़ा, लेकिन बहने वाला घोल तैयार करें (करीब-करीब डोसा के घोल जैसा)। घोल में कोई गांठ नहीं होनी चाहिए। इसे 8-10 घंटे या रात भर के लिए ढककर रख दें, ताकि खमीर उठ जाए। खमीर उठने के बाद घोल में हवा के बुलबुले दिखाई देंगे और थोड़ी खटास आ जाएगी।
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चाशनी बनाना: एक पैन में चीनी और पानी डालकर मध्यम आँच पर चाशनी बनाएँ। इसे गाढ़ा होने दें (एक तार चढ़ जाए, लेकिन बहुत गाढ़ी न बनाएँ)। चाशनी में इलायची पाउडर और केसर मिला दें। चाशनी को गर्म ही रहने दें।
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तलने की तैयारी: एक कड़ाही या पैन में घी/तेल गर्म करें। घोल को एक स्प्रिंकल बोतल (स्क्वीज़ी बोतल) या पारंपरिक मसलिन कपड़े से बनी कोंडी/झारनी में भर लें।
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आकार देना और तलना: कम आँच पर, गर्म घी में कोंडी से गोल-गोल घेरे बनाते हुए घोल डालें। पहले बाहर का घेरा बनाएं, फिर अंदर की ओर सर्पिल आकार बनाएं। एक बार में 3-4 जलेबियाँ तल सकते हैं।
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तलना: जलेबी को दोनों तरफ से सुनहरा और कुरकुरा होने तक तलें। निकालकर तेल निथार लें।
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चाशनी में डुबोना: तुरंत गर्म जलेबियों को गर्म चाशनी में डाल दें। करीब 30 सेकंड से 1 मिनट तक दोनों तरफ से चाशनी में डुबोए रखें, ताकि वह अच्छी तरह से सोख लें।
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सर्व करें: चिमटे से निकालकर जलेबियों को सर्विंग प्लेट में रखें। गर्मागर्म जलेबी का आनंद लें।
गलतियाँ और सुझाव:
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अगर घोल पतला है, तो जलेबी कुरकुरी नहीं बनेगी।
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अगर घोल गाढ़ा है, तो आकार बनाना मुश्किल होगा।
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जलेबी को हमेशा गर्म चाशनी में डुबोएं, नहीं तो वह चिपचिपी हो जाएगी।
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तेल का तापमान सही होना चाहिए – बहुत तेज़ आँच पर जलेबी जल जाएगी, और कम आँच पर तेल सोख लेगी।
अध्याय 6: जलेबी का सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व
जलेबी सिर्फ पेट भरने वाली मिठाई नहीं, बल्कि भारतीय समाज में इसकी एक विशेष पहचान है।
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त्योहारों और शुभ अवसरों की रानी: जलेबी हर शुभ काम, त्योहार और उत्सव का अभिन्न अंग है। दीपावली, होली, रक्षाबंधन, जन्मदिन, शादी, गृहप्रवेश – हर जगह इसकी मिठास चाहिए। कई जगहों पर इसे ‘मंगलकारी’ माना जाता है।
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सुबह की शुरुआत: उत्तर भारत के कई हिस्सों में, खासकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में, नाश्ते में गरम जलेबी-दही या जलेबी-दूध खाने की परंपरा है। यह एनर्जी से भरपूर नाश्ता माना जाता है।
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स्ट्रीट फूड का बादशाह: जलेबी भारत के हर शहर, कस्बे और गाँव की गलियों में मिल जाती है। सुबह-सुबह जलेबी वाले की दुकान से उठती खुशबू लोगों को अपनी ओर खींचती है।
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साहित्य और सिनेमा में जलेबी: जलेबी का ज़िक्र कविताओं, कहानियों और फिल्मों में भी खूब हुआ है। बॉलीवुड फिल्मों में अक्सर नायक-नायिका जलेबी खाते दिखाई देते हैं। यह बचपन और मासूमियत का प्रतीक बन गई है।
अध्याय 7: जलेबी से जुड़े रोचक तथ्य और वर्ल्ड रिकॉर्ड्स
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विश्व की सबसे बड़ी जलेबी: 2017 में, सूरत (गुजरात) में 1,750 किलोग्राम वजन की दुनिया की सबसे बड़ी जलेबी बनाई गई थी, जिसने गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। इसे बनाने में 500 लीटर तेल और 700 किलो चीनी लगी थी!
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अंतरराष्ट्रीय पहचान: जलेबी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं। इसे ईरान, ईराक, लेबनॉन, तुर्की, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में भी उनके अलग-अलग नामों और स्वादों के साथ पसंद किया जाता है।
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जलेबी और विज्ञान: 2021 में, भारतीय वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च में जलेबी के आकार और बनावट का अध्ययन किया था कि कैसे घोल का प्रवाह और तेल का तापमान इसके आकार को प्रभावित करता है। यह ‘फ्लूइड मैकेनिक्स’ का एक दिलचस्प उदाहरण है।
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फेरोज़ शाह कोतला की जलेबी: दिल्ली के फेरोज़ शाह कोतला क्रिकेट स्टेडियम के बाहर मिलने वाली जलेबी अपने अलग स्वाद के लिए मशहूर है और क्रिकेट प्रेमियों के बीच एक किंवदंती बन चुकी है।
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जलेबी पानी: राजस्थान के कुछ हिस्सों में, जलेबी को पानी में घोलकर एक ऊर्जा पेय के रूप में भी पिया जाता है।
अध्याय 8: आधुनिक युग में जलेबी – नए प्रयोग और ग्लोबल फ्यूजन
समय के साथ जलेबी ने भी नए रूप धारण किए हैं:
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जलेबी आइसक्रीम: वैनिला आइसक्रीम के ऊपर कुरकुरी जलेबी टॉपिंग।
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जलेबी सैंडविच: दो जलेबियों के बीच मलाई या रबड़ी भरकर।
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जलेबी केक और पैनकेक: घोल को केक या पैनकेक के रूप में पकाया जाता है।
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जलेबी चाट: टुकड़ों में कटी जलेबी पर दही, चाट मसाला और सेव।
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वेस्टर्न फ्यूजन: जलेबी वेफल्स, जलेबी मिल्कशेक, यहाँ तक कि जलेबी पिज़्ज़ा तक!
ये सभी प्रयोग दर्शाते हैं कि जलेबी एक लचीली और टिकाऊ पाक परंपरा है, जो नए ज़माने के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकती है।
निष्कर्ष: एक मिठाई, अनेक कहानियाँ
जलेबी का इतिहास सांस्कृतिक आदान-प्रदान, आविष्कार और अनुकूलन की एक शानदार गाथा है। चाहे वह अरब के रेगिस्तान में ‘ज़लाबिया’ के रूप में जन्मी हो या भारत की धरती पर ‘कुंडलिका’ के रूप में, आज यह पूरी तरह से ‘हमारी’ जलेबी बन चुकी है। इसने राजाओं के दरबार से लेकर गाँव के चौराहों तक, हर जगह अपनी मिठास बिखेरी है।
यह सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि जीवंत इतिहास का एक स्वादिष्ट हिस्सा है। अगली बार जब आप गरमा-गरम, कुरकुरी जलेबी का स्वाद लें, तो याद रखिए कि आप हज़ार साल पुरानी एक यात्रा का, अनेक संस्कृतियों के मिलन का, और भारतीय पाक कला की समृद्धि का स्वाद ले रहे हैं। जलेबी सचमुच ‘इतिहास की सबसे मीठी विरासत’ है!

