असल में भारत में बिकने वाली ज्यादातर लग्ज़री कारें पूरी तरह विदेश से तैयार होकर नहीं आतीं. करीब 90 प्रतिशत से ज्यादा कारें देश में ही असेंबल की जाती हैं. सालाना लगभग 51 से 52 हजार लग्ज़री गाड़ियां बिकती हैं, जिनमें मर्सिडीज-बेंज, BMW, जगुआर लैंड रोवर और ऑडी जैसे ब्रांड शामिल हैं. इन कंपनियों के प्लांट महाराष्ट्र और तमिलनाडु में हैं, जहां विदेश से पार्ट्स मंगाकर कारें जोड़ी जाती हैं. इन गाड़ियों की कीमत अक्सर एक करोड़ रुपये से ऊपर होती है.
CKD बनाम CBU को समझिए
इन पार्ट्स को तकनीकी भाषा में CKD किट कहा जाता है. इन पर लगभग 15 प्रतिशत इंपोर्ट ड्यूटी और 1.5 प्रतिशत सोशल वेलफेयर सरचार्ज लगता है, यानी कुल मिलाकर करीब 16.5 प्रतिशत टैक्स बनता है. इसके उलट, जो कारें पूरी तरह बनी हुई हालत में बाहर से आती हैं, जिन्हें CBU कहा जाता है, उन पर 70 से 110 प्रतिशत तक भारी टैक्स लगता है. प्रस्तावित समझौते में CBU पर लगने वाली ड्यूटी पहले करीब 40 प्रतिशत तक लाने और बाद में चरणबद्ध तरीके से 10 प्रतिशत तक घटाने की बात है.
लेकिन चूंकि भारत में बिकने वाली ज्यादातर लग्ज़री कारें पहले से ही कम टैक्स वाले CKD मॉडल्स हैं, इसलिए इनकी कीमतों में बड़ी कटौती की गुंजाइश कम नजर आती है. मर्सिडीज-बेंज इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO संतोष अय्यर ने Moneycontrol से बातचीत में साफ कहा कि इस समझौते से कीमतों पर तुरंत कोई खास असर पड़ने की उम्मीद नहीं है. उन्होंने बताया कि कंपनी की 90 प्रतिशत से ज्यादा बिक्री लोकली असेंबल्ड कारों की है और केवल करीब 5 प्रतिशत गाड़ियां यूरोप से पूरी तरह इंपोर्ट होती हैं.
मर्सिडीज, BMW भी भारत में असेंबल करती हैं कारें
मर्सिडीज अपनी कारें पुणे के पास चाकन प्लांट में असेंबल करती है और ज्यादातर किट जर्मनी से आती हैं. हाल ही में कंपनी ने Mercedes-Maybach GLS का लोकल प्रोडक्शन शुरू किया, जो अमेरिका के बाहर पहली बार हुआ. इससे इस मॉडल की कीमत करीब 42 लाख रुपये कम हुई, यानी लगभग 13 प्रतिशत की राहत मिली. यह उदाहरण दिखाता है कि कीमत घटाने में असली भूमिका लोकल मैन्युफैक्चरिंग निभाती है, न कि केवल ट्रेड एग्रीमेंट.
BMW भी लगभग यही रणनीति अपनाती है. कंपनी के करीब 10 में से 9 मॉडल भारत में ही असेंबल होते हैं. BMW Group India के प्रेसिडेंट और CEO हरदीप सिंह बराड़ का मानना है कि तुरंत कीमतों में बदलाव की संभावना नहीं है, लेकिन लंबे समय में यह समझौता फायदेमंद हो सकता है. उनके अनुसार, अगर CBU पर टैक्स कम होता है तो कंपनी नए इंटरनेशनल मॉडल्स भारत में लॉन्च कर सकेगी और मांग को परखकर आगे लोकल प्रोडक्शन का फैसला लिया जा सकता है.
निकट भविष्य में कीमतों में राहत नहीं!
जगुआर लैंड रोवर ने भी संकेत दिए हैं कि ट्रेड एग्रीमेंट से भारत में असेंबल की जाने वाली कारों की कीमतों में तुरंत बदलाव की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. कंपनी पुणे में कई Range Rover और Discovery मॉडल्स असेंबल करती है और चेन्नई के पास एक बड़ा प्लांट शुरू होने वाला है. यहां तक कि प्रस्तावित भारत-यूके फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के बावजूद भी कंपनी ने ग्राहकों को निकट भविष्य में कीमतों में राहत का भरोसा नहीं दिया है.
फरारी, लैम्बॉर्गिनी, पॉर्श खरीदेंगे तो मिलेगा लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसी को सबसे ज्यादा फायदा मिल सकता है तो वे सुपरकार ब्रांड हैं, जैसे Ferrari, Maserati, Lamborghini और Porsche, जो अपनी कारें पूरी तरह इंपोर्ट करते हैं. इसी तरह Rolls-Royce और Bentley जैसे अल्ट्रा लग्ज़री ब्रांड्स को भी भविष्य में किसी अलग ट्रेड एग्रीमेंट से फायदा हो सकता है.
हालांकि यहां एक और बड़ा फैक्टर है- करेंसी. बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये की कमजोरी टैक्स में मिलने वाले फायदे को काफी हद तक खत्म कर सकती है. 2025 में अकेले यूरो के मुकाबले रुपया करीब 19 प्रतिशत कमजोर हुआ था. इसी वजह से 2025 और 2026 की शुरुआत में कई लग्ज़री कार कंपनियों ने कीमतें बढ़ाईं. एक मार्केट एक्सपर्ट के मुताबिक, आने वाले कुछ सालों में भी करेंसी का असर टैक्स कटौती के फायदे को सीमित कर सकता है.
कुल मिलाकर कहा जाए तो भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से लग्ज़री कार बाजार की दिशा धीरे-धीरे बदल सकती है, लेकिन आम ग्राहक को तुरंत सस्ती कार मिलने की उम्मीद रखना व्यावहारिक नहीं है. असली राहत शायद लंबे समय में दिखे, जब कंपनियां नई रणनीतियों के साथ बाजार में उतरेंगी.